ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Tuesday, October 24, 2006

मेरी अपनी किरण

हमेशा सोचती थी
मेरे लिये भी
होगी सूरज की एक किरण
जो कभी ना कभी
तो मुझे तक आयेगी
और
दूर कर देगी
मेरे मन और जीवन मे
दूर तक फेले अंधरे को
पर शायद मेरे मन का
अँधेरा इतना गहरा है
की कोई किरण उसतक नहीं
आ पाई
अब तो मेरे मन ने
इंतज़ार ही करना बन्द
कर दिया
क्योकि कर्मो से ही मिलती है
उजालो की किरण

Sunday, October 15, 2006

मौन शांत सनाटा

यहीं से यहीं
वहीं से वहीं
कहीं से कहीं
पसरा हुआ है
सनाटा
मौन शांत सनाटा
क्या तूफ़ान जा चुका है
या फिर ये सनाटा
लायेगा एक नया तूफ़ान
मेरे मन मे या मेरे जीवन मे
यहीं से वहीं औरफिर कहीं
खो जाउँगी मै ऐसे सनाटे मे
शायद
यही मेरी नियति है
की मै अब आत्मसात कर लू इस सनाटे को
बिना शिक़ायत
क्योकि ये सनाटा तुमने दिया है
और तुम्हारा ही तो सब मेरा है
मौन भी , सनाटा भी

Saturday, October 14, 2006

याद

याद जब आती है
नींद भी अपने साथ
ले जाती है
ज़िन्दगी
का हर पल
जिया हुआ सच लगता है
पर फिर भी मन उस सच
से डरता है
जो वह आ कर बताऐगा
और नींद ही नहीं
याद करने के
अधिकार को भी
अपने साथ ले जायेगा

Sunday, October 01, 2006

क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते हें.

शादी बटना तन का
बटना मन का
बटना बिस्तर का
बटना एह्सासो का
क्या शादी सिर्फ बाटती है?
क्या कुछ भी ऐसा नहीं हें
जो जुडता है ?
क्यों मरता है मन
पर शादी नहीं टूट्ती
क्यों टूटते है एहसास
पर शादी नहीं टूटती
क्या सच मे शादी
नहीं टूटती
क्या केवल सात फेरे लेने से
बिस्तर पर साथ सोने से
बच्चो को दुनिया मे लाने से
नारी पत्नी होती है और पुरुष पति
बिना प्यार के शादी निबाहना
ईक झूठ को जीना ही है
शादी को बचाने मे
खतम हो रहा अपनापन
मिट रहा है सब कुछ
वह खुद और बाकी
सब कहते है
वह बहुत खुश है
वह बहुत तकदीर वाला है
उसके पास सब कुछ है
एक अच्छी पत्नी
दो प्यारे बच्चे
आलिशान घर शानदार नौकरी
पर मैने देखा है
उसका खालीपन
और मैने भी जिया है
उसके साथ उसका खालीपन
और मैने अपने खालीपन को
भर लिया है उसके
खालीपन से
मै उसकी पत्नी नहीं हूँ
मै उसकी प्रेमिका भी नहीं हूँ
मै तो उसकी कुछ भी नहीं हूँ
पर फिर क्यो मुझे तकलीफ होती है
जब वह समय नहीं पता है
राखी पर वह घर नहीं जाता
अपनी दीदी से रखी नहीं बंधवा पता
जब वह दशहेरा दिवाली मनाता है
पर अम्मा पापा के पास नहीं जा पता है
जब वह किसी और को चाहता है
उससे भी संबंध बनता है
पर फिर भी शादी निभाता है
एक झूठ को जीता जाता है
क्यों मुझे तकलीफ होती है
जब वह सब खोने के डर से
अपने को खोता जाता है
और शादी निभाने के लिये
सिर्फ झूठ ही बोलता जाता है
मेरी तकलीफ सिर्फ मेरी हें
क्योकि वह ज़माने के साथ
चल रहा है
जल रहा है
और चलता रहेगा
चुप चाप
और मै तकलीफ पाती रहूगी
क्योकि मै वह नहीं देख पाती
जो सब देख पाते हें.

और सफेद साड़ी मे सिर ढंके मेरी दादी




स्कूल से आना
और दादी का रोटी गरम करके खिलाना 

बूढ़े  कांपते  हाथो से तवा ना उठा पाना
गैस जलना भी ना आना
पर
स्टोव जला कर तश्तरी पर रोटी गरम करना
और गुड्डन  ,  पिंकी को खिलाना
मुझे याद है अपनी दादी का
अनकहा प्यार और
आज भी सब दिखता है
आखे बंद करती हूँ
तब भी दिखता है
वह वरंडा,
वह मेज
वह स्टोव
और सफेद साड़ी मे सिर ढके मेरी दादी

रंग

बचपन कब आया कब गया
याद ही नहीं
कुछ याद है तो दादी से मिला
बे इनतिहा प्यार
और फिर याद है
शरीर का रंग बदलना
और उसके साथ ही
हर अपने का रंग बदलना

वह चीख चीख कर कहती है मै आज की नारी हूँ

वह आज की नारी है
हर बात मे पुरुष से उसकी बराबरी है
शिक्षित है कमाती है
खाना बनाने जेसे
निकृष्ट कामो मे
वक़्त नहीं गवाँती है
घर कैसे चलाए
बच्चे कब पैदा हो
पति को वही बताती है
क्योकि उसे अपनी माँ जैसा नहीं बनना था
पति को सिर पर नहीं बिठाना था
उसे तो बहुत आगे जाना था
अपने अस्तित्व को बचाना था
फिर क्यों
आज भी वह आंख
बंद कर लती है
जब की उसे पता है
की उसका पति कहीँ और भी जाता है
किसी और को चाहता है
समय कहीं और बिताता है
क्यों आज भी वह
सामाजिक सुरक्षा के लिये
ग़लत को स्विकारती है
सामाजिक प्रतिशठा के लिये
अपनी प्रतिशठा को भूल जाती है
और पति को सामाजिक प्रतिशठा कव्च
कि तरह ओढ़ती बिछाती है
पति कि गलती को माफ़ नहीं
करती है
पर पति की गलती का सेहरा
आज भी
दूसरी औरत के स्रर पर
रखती है
माँ जेसी भी नहीं बनी
और रूह्रिवादी संस्कारो सै
आगे भी नहीं बढी.
फिर भी वह चीख चीखकर कहती है
मै आज की नारी हूँ
पुरुष की समान अधिकारी हूँ

सपने

सपने
पूरे हो जायें तो अपने
नहीं तो सपने

दो पहलू

प्यार
मेरा सच
उसका झूठ

ज़िंदगी
उसकी ज़रूरत
मेरी
मजबूरी