ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Friday, October 31, 2008

कितनी आसान होती ये ज़िन्दगी

कितनी आसान होती ये ज़िन्दगी
अगर दोस्त लबादा ना पहने होते
बहुत आसान होता है
दुशमनो को पहचानना
पर दोस्ती का लबादा
पहने दुशमनो को
कैसे पहचानू
जो बार बार मिलते है
नये नये भेस मे
और जब जाते है
तो सब एक से लगते है

Thursday, October 30, 2008

प्यार रिश्तो का मुहताज नही होता

रिश्तो की जमा पूंजी से
जिन्दगी का खाता तो
हमेशा ही खाली था
पर
सुना था की
प्यार रिश्तो का
मुहताज नही होता
फिर क्यों मै
प्यार के सहारे
जिन्दगी की वैतरणी को
पार नहीं कर पायी

Tuesday, October 28, 2008

दम्पति दिया दिवाली

हर विवाह उत्सव के बाद
होती हैं पूजा
कुल देवता कि
नव दम्पति साथ मिल कर
एक करते हैं बाति दो दियों कि
पर फिर दिवाली पर भूल जाते हैं
बिना बाति को मिलाए ही
दिये जलाते हैं
और इसीलिये
बहुत से दम्पति
शादी को कभी जी ही
नहीं पाते हैं ।

Saturday, October 25, 2008

भीड़ तुम और मै

अब एक भीड़ का हिस्सा ही हो तुम
आज फिर भीड़ मे , मै घूमती रही
बस तुमको सिर्फ़ तुमको ही ढूंढ़ती रही
बीतते समय के साथ धुंधला जाता हैं अक्स
शायद इसी लिये भीड़ मे भी अब नहीं दिखते हो तुम

Thursday, October 23, 2008

शतरंज

आज की भागम भाग जिन्दगी मे
सब की बिसात बिछी है
किसी का घोडा ढाई घर चलता है
किसी का ऊंट तिरछी चाल से मारता है
किसी का हाथी सीधा ही भिड़ता है
सब को चिन्ता है अपने अपने वजीर की
और सब बचाना चाहते है अपने राजा को
शह और मात के खेल मे
कब बाजी पलट जाये क्या पता
६४ खानों मे ६४ कलाये सबको दिखानी हैं
अपने को सफ़ेद और दूसरो को काला
बता कर बाज़ी जीतनी हैं

Monday, October 20, 2008

भगवा नहीं तिरंगा हैं हिंदू

हिंदू
ह से हमेशा
न से नम्रता
द से देता
जी हाँ
हिंदू ही
हमेशा नम्रता से देता आया हैं
सब को अपने मे समाता आया हैं
इतना विशाल हैं हिंदू की जितना भी डालोगे
आँचल का विस्तार उसका उतना ही होगा
केवल और केवल छाँव ही देगा आँचल उसका


भगवा नहीं हैं हिंदू
एक तिरंगा हैं हिंदू
हरे मे है प्यार उसका
उनके लिये जो उससे दूर हो कर
देश नया बनाते हैं
सफ़ेद मे हैं शान्ति उसकी
उनके लिये जो समय असमय
अशांति फैलाते हैं
कभी किसी कट्टर हिंदू से
दोस्ती तो कर कर देखो
कट्टरता से प्यार करेगा तुमको
मर जायेगा पर
तुम पर आंच ना आने देगा

Sunday, October 19, 2008

हिंदू यानी कट्टरपंथी ??

हिंदू यानी कट्टरपंथी
बिल्कुल सही
तभी तो
हर रिश्ते को कट्टरता से
हिंदू ही निभाता हैं
हर धर्म को अपने मे
हिंदू ही समाता हैं
बिना ख़ुद को बदले
बिना दुसरो को बदले
सर्वधर्म सहिष्णु
सापेक्ष नहीं निरपेक्ष
हिंदू ही कहलाता हैं
हिंदुस्तान की नींव हैं हिंदू
नींव कौन हिला पाया हैं
संस्कार कौन बदल पाया
भाई कहा तो भाई माना
हिंदू होने का मतलब
बस हमे इतना ही हमारे
संस्कारो ने हमको समझाया हैं
अच्छा ही हैं कि कट्टरवादी
हमारे संस्कारो ने हमे बनाया हैं

Saturday, October 18, 2008

धर्मं नहीं हैं "हिंदू"

हिंदुस्तान मे धर्म हैं
मुस्लिम , सिख , ईसाई
और हिंदू ?

धर्मं नहीं हैं "हिंदू"
हिंदुस्तान मे
हिंदू यानि
हिंदुस्तान की सभ्यता और संस्कृति
हिंदू यानि सर्वधर्म समन्वयता
हिंदू यानी सर्वधर्म सहिष्णुता

पाकिस्तान मे हिंदू यानी एक धर्म
इटली मे हिंदू यानी एक धर्म
लन्दन मे हिंदू यानी एक धर्म

पर हिंदुस्तान मे हिंदू
यानी
एक जीवन शैली
एक आस्था
एक विश्वास

काई

रिश्तों के ऊपर
जब काई आजाती है

रिश्ते सड़ जाते है
लोग फिर झूठ बोल कर
खुद को बचाते है

और भ्रम मे रहते है
की उन्होने रिश्तों को
बचा लिया
रिश्ता तो कबका
दम तोड़ चूका होता है
काई के नीचे
झूठ और अविश्वाश कि गंध से
काई से अच्छे से अच्छा भी
हो जाता है बुरा

ये कविता अपने ओरिजनल फॉर्म मे इंग्लिश मे है और काफी लंबी हैं ।

Friday, October 17, 2008

वो मुसलमान हैं मै हिंदू हूँ

वो मुसलमान हैं मै हिंदू हूँ
मेरा धर्म मेरा हैं
उसका धर्म उसका हैं
मेरी आस्था मेरी हैं
उसकी आस्था उसकी हैं
पर देश हमारा एक हैं
मैने कभी उससे नहीं पूछा
क्या तुमको यहाँ कोई तकलीफ हैं
क्यूँ पुछू उसका अपना घर हैं
उसका अपना देश हैं
उसको तकलीफ होगी तो
वो ख़ुद झेलेगा और निपटेगा
लडेगा ख़ुद अपने हक़ के लिये
और लेके रहेगा अपना हक़
अपने घर मे क्या आराम
और क्या तकलीफ
बारबार जो उसकी तरफदारी मे
उठ खडे होते हैं
अहसास वाही उसको कराते हैं
की तुम मुसलमान हो
हमारे घर मे रह रहे हो
तुमको बचाना हमारा धर्म हैं
धर्म की परिभाषा की आड़ मे
मिलकियत वही देश पर दिखाते हैं
जो केवल ईद पर
मुसलमान को गले लगाते हैं
ग़लत होगा जो
हिंदू हो या मुसलमान
देश का कानून ख़ुद निबटेगा
मानवता को शर्मसार जो करेगा
धर्म उसका ख़ुद उसको कचोटेगा
मत याद दिलाओ बारबार की
ईद पर पिछले बम्ब धमाको के बाद
दिवाली हिन्दुओ ने नहीं मनाई थी
और नवरात्रि की मन्दिर मे भगदड
के बाद ईद मुसलमानों ने नहीं मनाई थी
क्युकी सब ने सिर्फ़ और सिर्फ़
तब अपना धर्म निभाया था
धर्म मानवता का
धर्म देश प्रेम का
धर्म भाई चारे का

Wednesday, October 15, 2008

हिन्दुस्तानी या भारतीय

मेरी सरज़मी हैं हिंदुस्तान
हिन्दुओ का स्थान
फक्र हैं मुझे की मै
हिंदू हूँ , हिन्दुस्तानी हूँ

एक मुसलमान लड़की ने
साड़ी पहन कर
तसवीर अपनी सबको दीखाई
सबकी लाडली बनी और
ताली सब हिन्दुओ ने बजाई

किसी को वो बहादुर और
किसी को वो अपनी बेटी नज़र आयी
उसके तीखे लेखन पर जो करतल ध्वनि
करते नज़र आते हैं अपनी बेटी को
चुप रहने और मीठा बोलने का पाठ पढाते हैं

कहा लिखा हैं की साड़ी
हिन्दुओ की पारम्परिक पोशाक हैं ??
क्या हिंदू चाहते हैं की
उनकी बेटिया बुर्का पहने और
मुसलमानों से ताली पाए

मन्दिर शायद ही रोज मै जाती हूँ
क्युकी मेरा कर्म ही मेरी पूजा हैं
साड़ी ही नहीं हैं
स्कर्ट , जींस , टॉप , गरारा , शरारा
और सूट भी पहनती हूँ
क्या इसीलिये कहा जाता हैं
मै पाश्चात्य सभ्यता की अनुयाई हूँ
और समाज मै अनैतिकता मुझ से आती हैं


जो पाश्चात्य सभ्यता के अनुयाई हैं
जिनके धर्म मे पुजती हैं " वर्जिन मेरी "
वो सबसे ज्यादा परेशान नज़र आते हैं
भारतीय सभ्यता पर पाश्चात्य सभ्यता
के दुश प्रभाव से


हिन्दी हैं भारत माँ के माथे की बिंदी
हिंदू को वो समझाते हैं
जिनके याहां बिंदी
लगाना पाप या कुफ्र हैं


मिशनरी स्कूल मै पढ़ती थी
मिशनरी का मतलब था
एक मिशन से बंधा हुआ
मिशन बच्चो को पढाने का
उनमे शिक्षा का प्रसार करने का
और वही होता था
फिर अब कैसे और क्यूँ
मिशनरी का मतलब बन गया
मिशन बच्चो को धरम के प्रति
जागरूक बनाने का


कही किसी मुस्लिम लड़की ने लिख दिया
मार दो गोली मुसलमानों को
सजदे मै झुक गए हजारो हिंदू सिर
अपनी बेटियाँ आगे ना जाए
दुसरो की बेटियाँ आगे जाए
क्या यही होता हैं हिंदू होना



एक नन को संत उन्होने बनाया
हमने भी नमन किया और
सर माथे उसे बिठाया
पर हमारे भगवान् ढकोसला
हमारा धरम कट्टरवादी
ये भी वही कहते हैं

क्यूँ सुने हम
क्या अब अपने देश मे
हिंदू को पूजा करने के लिये
उनकी आज्ञा लेनी होगी



हिंदुस्तान मे तुम जहाँ
चाहो मस्जिद और चर्च बनाओ
पर एक हिंदू मन्दिर अगर
रोम मे बनाना हो तो
सरकारी परमिशन लाओ


हिंदू सुहागिन का मंगल सूत्र
बस और बस एक जेवर

होता हैं दूसरे देश मे !!

दर्द होता हैं जब
अपमान होता हैं
हमारी संस्कृति का


क्या भारतीय होना
हिन्दुस्तानी होने से अलग होता है
क्यूँ जब भारतीये होने की बात आती हैं
तो सब भारतीये बनने को तैयार हैं
पर हिन्दुस्तानी कहने मे
उनको हिंदू होने की गंध आती हैं


क्यूँ
अपने ही देश मे हिन्दुस्तानी
विदेशी होता जारहा हैं
और भारतीये का चोला पहन
हर विदेशी हिंदुस्तान को
इंडिया बना रहा हैं

Friday, October 10, 2008

झरना बावडी

झरना बह रहा था
बावडी प्यासी थी
सोचा उसने
झरने को अपने मे समा लू
अपनी प्यास बुझा लू
झरने ने अपनी राह बदली

बावडी को भर दिया
तब बावडी ने जाना
प्यासी वोही नही थी
झरना तो उससे भी ज्यादा
प्यासा था , कही समाना चाहता था
इसीलिये वह खुद बावडी तक आया
उसको भरा और फिर उसको अपने मे
समेट आगे चला
बावडी फिर कही नहीं थी
झरना भी विलुप्त हो गया था
बस बह रही थी
एक नदी प्यार की

Sunday, October 05, 2008

लाईट लो बिटिया - पत्नी बनकर जीवन लाईट होता हैं

तुम सदियों से लाईट लेते रहे
पत्नी पर व्यंग करते रहे और
सुधिजन संग तुम्हारे मंद मंद हँसते रहे
घर मे हमको लाकर
व्यवस्था के नाम पर
वो सब हम से करवाया
बिना हम से पूछे की
क्या हमने करना भी चाहा
हमारी पढाई गयी चूल्हे मे
तुम्हारी पढ़ाई से तरक्की हुई
हमारे माता पिता का सम्मान
उनके दिये हुए सामान से
तुम्हारे माता पिता का सम्मान
तुम्हे पैदा करने से
हम चाकर तुम मालिक
घर तुम्हारा बच्चे तुम्हारे वंश तुम्हारा
तुम हो तो हम श्रृगार करे
ना हो तो सफ़ेद वस्त्र पहने
हम पर कब तक व्यंग
और फब्तियां कसोगे
उस दिन समझोगे की
पिता की पीडा क्या होती हैं
जब अपनी बेटी ब्याहोगे
हम तब भी उसको यही समझायेगे
जो हमारी माँ ने हमको समझाया
बिटिया निभा लो जैसे हमने निभाया
समझोते का नाम जिन्दगी हैं
और जिन्दगी जीने का अधिकार
पति का हैं
पत्नी को तो जीवन
काटना होता हैं
लाईट लो बिटिया
पत्नी बनकर जीवन लाईट होता हैं
क्योकि भार तुम्हारा , तुम्हारा पति कहता हैं
की वह ढोता हैं
और
समय असमय व्यवस्था के नाम पर
पत्नी को कर्तव्य बोध कराता हैं
फिर
ख़ुद लाईट हो जाता हैं
पत्नी की भावनाओं को हमेशा लाईट ही लिया जाता हैं । ये कविता केवल एक कोशिश हैं पत्नी को लाईट ना समझ कर सीरियस समझने की । और बात अगर मनवानी पड़े तो समझिये की बात मे कुछ ग़लत जरुर हैं क्युकी पत्नी के पास भी एक दिमाग होता हैं सही और ग़लत समझने का । पत्नी आप की दासी नहीं होती की हर बात माने

Wednesday, October 01, 2008

बस ऐसे ही, बस यूँही

नवरात्रि मे ईद मुबारक भी कहते हैं हम और
धर्म- मज़हब के नाम पर मरते मारते भी हैं हम