ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Sunday, September 27, 2009

मौन

मौन
जब अपने संवाद
सिर्फ़ हमे ही सुनाई देते हैं

मौन
जब कहीं कुछ दरक जाता हैं
और आवाज सिर्फ़ हम तक आती हैं

मौन
जब स्वीकृति
शब्दों से नहीं
एहसासों से दी जाती हैं

मौन
जब अश्रु आँख से नहीं
दिल से बहते हैं

मौन
जब शब्द नहीं
एहसास बोलते हैं

और
अपनों के ही नहीं
गैरो के दिल तक भी पहुचते हैं

Saturday, September 26, 2009

खवाहिशे

होती हैं कुछ खवाहिशे ऐसी
जो हम को हम नहीं रहने देती

Wednesday, September 23, 2009

बस यू ही

असंभव को सम्भव
करने की चाहत मे
यादो को भुलाने की कोशिश
बदस्तूर ज़ारी हैं

Sunday, September 20, 2009

चलो मौलिक हो जाए

गालिब की तर्ज पर
ग़ज़ल तुकाए
तुलसी की चौपाई
रहीम की दोहे
तोडे मरोडे
और
ख़ुद कवि कहलाये
सितारों को चाहे
अपना प्यारा बताये
और सतही
जमीनी बातो को

भूल जाये


चलो मौलिक हो जाए
और
दूसरो की मौज उडाये

हिन्दी मे नहीं कोई शैक्षिक योग्यता
फिर भी हिन्दी को जांचे

और
तू अच्छा लिखे ,

वो ख़राब लिखे
बार बार समझाये


चलो मौलिक हो जाए
और
एक से दूसरे को भिडाये

अपने पर पड़ जाए
तो
कविता और छंद मे
रोये और गाये

चलो मौलिक हो जाए
और
दूसरो की मौज उडाये


Friday, September 18, 2009

क्यूँ फिर

जरुरत अपनी

मजबूरी अपनी

दर्द अपना

तकलीफ अपनी

फिर क्यूँ

दोष होता हैं

ईश्वर का

Thursday, September 17, 2009

ना जाने कब

न जाने किस आहट पर
कौन आ जाए
जिन्दगी की रफ़्तार
ना जाने किस मुकाम
पर जा कर थम जाए
ना जाने कब
किसी के आने से
साँसों की रफ़्तार बढ़ जाए
और
ना जाने कब
साँसों की रफ़्तार
रुकने से कोई चला जाए

Monday, September 14, 2009

बस ऐसे ही

हिन्दी है भारत माँ के माथे की बिंदी
पर मांग अभी भी अग्रेजी की हैं
रंग आज भी सबको गोरा ही चाहिये
गोरा रंग होगा तो गोरो की मानसिकता होगी
फिर हिन्दी बोलो या इंग्लिश कोई फरक नहीं हैं
क्युकी दासता हैं अब भी गोरो की
काला और गेहुयाँ आज भी
दोयम हैं
सुन्दरता का पैमान आज भी "गोरा" हैं

Friday, September 04, 2009

तुम और मै

माना कि तुम आज

बहुत ऊँचे पहुंच गये हो

बहुत बडे बन गए हो

नहीं

उस ऊँचाई पर मै

कभी नहीं होना चाहती थी

जहाँ ,

इंसान आदमी बन कर रह जाता हैं

तुम्हे तुम्हारी प्रसिद्धता मुबारक

मै अपनी इंसानियत मे

खुश हूँ