ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Friday, July 29, 2011

बारिश की बूंदे

ये बारिश की बूंदे हैं
या आसमां से
जन्नत का नूर
धरती पर गिर रहा हैं
प्यासी धरती को सीच रहा हैं
और
ना जाने कितने
मनो को भिगो रहा हैं

Wednesday, July 27, 2011

बिंदी, दर्प और अस्तित्व

क्या भूल गए की मेरी ये बिंदी
जिसका दर्प तुमको आज दिख रहा हैं
उसका अस्तित्व तुम से ही बना हैं
जिस दिन ये बिंदी मैने माथे पर लगा ली
उस दिन से अपने अस्तित्व को खो दिया
तुमने तो केवल समुद्र और दो गज जमी ही खोई
मेरा तो सारा अस्तित्व ही ये बिंदी ही लील गयी
और फिर भी इस का दर्प तुमको दिखता रहा

Wednesday, July 06, 2011

जिन्दगी का सच

ना जाने कितने समय से समय रुका हैं
ना जाने कितने रुके हुए पल
रोज छिन्न भिन्न होते हैं
और लोग कहते हैं
हम जिंदा हैं

Friday, July 01, 2011

घर बनाने का अधिकार नारी का नहीं होता

घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता
घर तो केवल पुरुष बनाते हैं
नारी को वहाँ वही लाकर बसाते हैं
जो नारी अपना घर खुद बसाती हैं
उसके चरित्र पर ना जाने कितने
लाछन लगाए जाते हैं

बसना हैं अगर किसी नारी को अकेले
तो बसने नहीं हम देगे
अगर बसायेगे तो हम बसायेगे
चूड़ी, बिंदी , सिंदूर और बिछिये से सजायेगे
जिस दिन हम जायेगे
उस दिन नारी से ये सब भी उतरवा ले जायेगे
हमने दिया हमने लिये इसमे बुरा क्या किया


कोई भी सक्षम किसी का सामान क्यूँ लेगा
और ऐसा समान जिस पर अपना अधिकार ही ना हो
जिस दिन चूड़ी , बिंदी , सिंदूर और बिछिये
पति का पर्याय नहीं रहेगे
उस दिन ख़तम हो जाएगा
सुहागिन से विधवा का सफ़र
लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा
क्यूंकि
घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता