ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Thursday, September 29, 2011

"जीता हैं दुनिया को मैने शब्दों से "

I Conquer The World With Words by Nizar Qabbani
"जीता हैं दुनिया को मैने शब्दों से " अनुवाद - रचना

I conquer the world with words,
जीता हैं दुनिया को मैने शब्दों से
conquer the mother tongue,
जीता हैं बोलो को
verbs, nouns, syntax.
सर्वनाम , संज्ञा और विषय वर्णन को
I sweep away the beginning of things
बहा दिया हैं शुरुवात की प्रक्रिया को
and with a new language
एक नयी भाषा से
that has the music of water the message of fire
जिस मे हैं संगीत पानी का और सन्देश अग्नि का
I light the coming age
ज्वलंत किया हैं मैने आने वाले समय को
and stop time in your eyes
और रोक दिया हैं समय को तुम्हारी आँखों मे
and wipe away the line
और मिटा दी वो महीन रेखा
that separates
जो अलग कर रही थी
time from this single moment.
समय को इस पल से

Tuesday, September 20, 2011

जब ऐसा हो तो

क्या कभी आप के साथ भी ऐसा हुआ हैं
की
चाँद तो ढला हो पर रात ना बीती हो
और
सूरज तो निकला हो पर सुबह ना हुई हो

Wednesday, September 14, 2011

बस्ती

हिंदी वही जा बसती हैं
जहां बस्ती हैं अपनों की
फिर भी ना जाने क्यूँ लगता
किस देश मे बसती हैं अपनों की
किसी बस्ते में बंद हैं अपने
बसा के बस्ती अपनों की

Thursday, September 08, 2011

स्व से विलोम

मिल भी गया गर तुम्हारा स्व तुमको
क्या कृष्ण और बुद्ध तुम बन पाओगे
और बन भी गये
तो भी क्या पाओगे
ये स्व बहुत भगाता हैं
जब मिलता हैं
पाने वाला विलोम हो जाता हैं