ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
COPYRIGHT 2007.© 2007. The blog author holds the copyright over all the blog posts, in this blog. Republishing in ROMAN or translating my works without permission is not permitted. Adding this blog to Hindi Aggregators without permission is voilation of Copy Right .
ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Sunday, April 29, 2012

बस यूही नहीं लिखा हैं मन था इस लिये ही कहा हैं

सभ्यता 
अगर कपड़े पहनने से 
आजाती 
सो समाज में  
सब सुरक्षित होते 
कपड़े 
सुरक्षा कवच मात्र हैं 
शरीर के 
असंख्य हैं जो 
कपड़े पहने रह कर भी 
असभ्य हैं 
क्या दर्पण उनको दिखाना 
और उनको ये अहसास कराना की 
उनकी असभ्यता से 
नगनता बढ़ रही हैं 
गलत हैं


      

Friday, April 20, 2012

प्यार


प्यार अगर
दो से होजाये 
तो 
पहले को छोड़ना 
और 
दूसरे से निभाना  
ही 
सही होता हैं 

क्युकी 
अगर 
प्यार पहले से होता 
तो 
दूसरे का वजूद ही ना होता 

Thursday, April 05, 2012

माँ बेटी यानी एक घर

चल दिये हैं अब हम
चारदीवारो को
एक बार फिर
घर बनाने
हम
यानि
एक बेटी और एक माँ
वैसे एक बेटी और एक माँ
होती हैं जहां
घर खुद बा खुद बन ही जाता हैं