ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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और सफेद साड़ी मे सिर ढके मेरी दादी

स्कूल से आना
और दादी का रोटी गरम करके खिलाना
बूठे कापते हाथो से तवा ना उठा पाना
गैस जलना भी ना आना
पर
स्टोव जला कर तश्तरी पर रोटी गरम करना
और गुडन और पिंकी को खिलाना
मुझे याद है अपनी दादी का
अनकहा प्यार और
आज भी सब दिखता है
आखे बंद करती हूँ
तब भी दिखता है
वह वरंडा,
वह मेज
वह स्टोव
और सफेद साड़ी मे सिर ढके मेरी दादी

2 comments:

Anonymous said...

Arvind said...
कविता पसन्द आई .अच्छी है.
अरविन्द चतुर्वेदी,
भारतीयम्

June 07, 2007
राजीव रंजन प्रसाद said...
बहुत ही अच्छी रचना है..

*** राजीव रंजन प्रसाद

June 07, 2007
Reetesh Gupta said...
अच्छा लगा पढ़कर आपकी स्मृतियाँ....बधाई

June 07, 2007
अनूप शुक्ला said...
बहुत् अच्छी लगी कविता!

June 07, 2007
अनूप शुक्ल said...
बहुत अच्छी रचना है।

June 07, 2007

Shastri J C Philip said...

यह हफ्ता हिन्दी चिट्ठा जगत के लिये काफी महत्वपूर्ण था. काफी अच्छे लेख एवं कवितायें प्रकाशित हुईं. प्रस्तुत है उन मे से चुने हुए कुछ जो पाठक को सोचने के लिये मजबूर करते हैं, या जो उसे उपयोगी जानकारी से संपुष्ट करते हैं.
http://sarathi.info/archives/225
Shastri J C Philip