मेज पर रखा ठंडा खाना
खाली पानी का ग्लास
भावनाशून्य आंखे
ठंडे पड़े जज्बात
पसरा हुआ सनाटा
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Saturday, May 17, 2008
उदासी के चित्र
Friday, May 16, 2008
Thursday, May 15, 2008
प्रगाढ़ संबंधो की पीड़ा
कभी सुख कभी दुःख
कभी आंसू कभी हसीं
वह लेते रहे
वह देती रही
सम्बन्ध प्रगाढ़ रहे
साथ पर ना वह रहे
प्रगाढ़ संबंधो मे
ना बाँट सकने कि
पीड़ा को
वह महसूसती रही
वह खामोश देखते रहे
Thursday, May 08, 2008
घुटन
उसे जिसे
बंद खिड़की होने के
एहसास से ही
घुटन होती थी
उसके लिये दरवाजे सब
मैने बंद कर दिये
कह दिया जाओ
जियो अपनी जिंदगी क्योकि
हर बार जब भी
दरवाजा तुम बंद करते थे
मै खिड़की खुली रखती थी
ये सोच कर कि
तुम को घुटन ना हो
पर अब मै थक गयी हूँ
तुम्हारे बंद किये
खिड़की दरवाजो को खोलते
सो अब निर्णय मेरा है
दरवाजा बंद रखने का
Sunday, April 27, 2008
आज़ादी
देखा मैने कुछ लोगो को
पूछा मैने उनसे
क्या करोगे ??
अगर आजादी मिल गयी तुमको
जवाब मिला गरीबो मे बाँट देगे
वह बेचारे भी इसे ओढ़ बिछा लेगे
Friday, April 11, 2008
नमी तुम्हारी आंखो की
मन मे था प्यार होठो पर हँसी
खाली हाथ तुम गये दूर मुझ से
मन मे था पश्चाताप आंखो मे नमी
भूल गए हो तुम
आ कर ले जाओ
हँसी खुशी से रहो
और नमी तुम्हारी आंखो की
मेरी आंखो मे रहे
Saturday, April 05, 2008
काश
हर बात का एक दूसरा रुख भी होता है
काश तुम देख सकते
हर रुख मे एक नया आयाम होता है
काश तुम समझ सकते
हर आयाम मे एक नया मोड़ आता हैं
काश तुम साथ चले तों होते
हर काश मे एक आह होती है
काश तुम महसूस कर सकते
Thursday, April 03, 2008
एक घुटन भरी डायरी - असफल औरत
एक घुटन भरी डायरी
यानि एक असफल औरत
एक सफल पुत्री
एक सफल पत्नी
एक सफल माँ
और एक असफल इंसान
मानसिक रूप से टूटी
सामाजिक रूप से सुरक्षित
गलती हमेशा अपनी नहीं
किसी और की खोजती
सब सुविधा से घिरी
फिर भी असंतुष्ट
सदियों से केवल साहित्य रचती
एक घुटन भरी डायरी लिखती
एक असफल औरत जो
इनसान ना बन सकी
राह अपनी ना चल सकी
क्योकी चाहती थी
राह के कंकर कोई चुन देता
सिर पर छाँव कोई कर देता
और सफल इंसान वो कहलाती
घुटन से आजादी वो पाती
Friday, March 28, 2008
ज्वलंत प्रश्न हैं अनुतरित
एक सेट मोल्ड { सांचे } मे नारी
यानी मोम की गुडिया
युगों से दब दब कर
दूसरो के मनचाहे आकार मे जो
ढलती रही , पसंद आती रही
एक सिरे पर ही नहीं
दोनों सिरों पर जलती रही
आज उसी मोल्ड { सांचे } को तोड़ कर
जो मोम बह रहा हैं
लावा सबको लग रहा हैं
क्योकी जलने के साथ साथ
वह लावा जला भी रहा है
जहाँ जहाँ से बह रहा है
तोड़ कर अपनी सीमाये
कौन हैं जिमेदार है इस
लावे के बहाने का
कौन करेगा ठंडा इस मोम को
जो लावा बन चुका है
क्या नारी ?
बनकर दुबारा सहनशीलता की प्रतिमा
क्या पुरूष ?
बनकर सहनशील , उदारशील
क्या समाज ?
बदल कर मान्यताये अपनी
ज्वलंत प्रश्न हैं अनुतरित
Monday, March 24, 2008
अनचाहे सपने
नहीं है मेरे हाथो मे
कि रोक सकूं मै
तुम्हारा आना
सपनो मे ।
पर आंखे तों मै अपनी
खोल ही सकती हूँ
नींद से जग तों सकती हूँ
अनचाहे सपनो से
बच तों सकती हूँ ।
अपने कल के सपनो से
अपने आज को बचा कर
अपने कल को सुरक्षित
कर तों सकती हूँ ।
Wednesday, March 19, 2008
बोली यादे
दिल के बंद दरवाजो पर
दस्तक देती यादो से पूछा मैने ,
क्यों बारबार बंद दरवाजो को खटखटाती हो ?
क्यों बिन बुलाये हर तीज त्यौहार चली आती हो ?
एक याद बोली ,
मै आती कहा हैं , तुम बुलाती हो
दूसरी याद बोली ,
आती हूँ इसलिये ताकि तुम अकेली ना महसूस करो
फिर तीसरी याद ने कहा ,
मै आती नहीं भेजी जाती हूँ
वो ही मुझे बार बार तुम तक भेजते हैं ,
जो ख़ुद आ नहीं पाते हैं
यादो की दस्तक जारी हैं ,
दिल के बंद दरवाजो पर
Friday, March 14, 2008
बदले हुए युग की सीता और अहिल्या
क्यों बनू अहिल्या मै
शापित जीवन क्यों मै काँटू
बन कर इक शिला
जीवन अगर मेरा शापित है
तो भी क्यों न उसे जीउँ मै
क्यों इंतज़ार करू मै
किसी राम के आगमन का
नहीं मै अहिल्या नहीं बनूगी
युग अब बदल गया है
मर्यादा पुरुषोतम
राम नाम
कही खो गया है
जो पत्थर मे ड़ाल सकें प्राण
और शाप ना देना मुझको
ना लेना अब कोई परीक्षा
क्योकि युग बदल गया हैं
अब ऐसी ग़लती न करना
बदले हुए युग की सीता
और अहिल्या ने अब
लक्ष्मण रेखा अपने
चारो और खीच ली हैं
जहाँ आकर तुम्हारे
शाप की परिधि समाप्त हो जाती है
और तुम्हारे भस्म होने की
सीमा शुरू हो जाती हैं
Wednesday, March 12, 2008
हाँ , तुम नारी हो
क्यो तुम लड़ती रहीं
क्यो तुम जूझती रहीं
क्यो तुम चाहती हो
बदलना मानसिकता औरो की
क्या फरक हैं फिर तुममे और उनमे
मत जुझो , मत लडो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता
जियो उस स्वतंत्रता को जो
इश्वरिये देन , जो नहीं कोई और तुमेह देगा
नारी हो नारी ही बन कर रहो
प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लडो , मत जुझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ
अधूरी तुम नहीं हो , क्योंकी तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो
तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की ,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है
Saturday, March 08, 2008
होली
याद हैं होली जो बीती थी उस साल
जब हम साथ साथ ना होते हुए भी
साथ साथ थे ,
तरंगों से जुडे थे मन हमारे
कितने ही संदेशे आये गये
ना जाने कितने रंग बिखरे
रीता मन भीगा दोनों का
फिर आ रही हैं होली
पर रीति ही जायेगी
रंग अब ना बिखेर पायेगी
Saturday, February 23, 2008
वाह !! कितनी ज्वलंत हैं आज , "कल" की "भोली" नारी
लजाती सकुचाती
सिमिटी सकुचाई
शांत , मौन
तब कुछ ना बोली
जब दान हो कर
पिता से दहेज़ लेकर
चली पीया के संग
नारी धन कमाती
स्वाबलंबी , नौकरी करती
पति के संग आती जाती
सुरक्षित महसूसती
तब कुछ ना बोली
नारी ममता को अनुभाती
सामाजिक गरिमा पाती
तब कुछ ना बोली
और जब सब पा लिया
तो आवाहन किया
समय हैं
अब आत्म मंथन का
समाज मे फैली कुरीति
कन्यादान क्यों ? पर सोचने का
समाज मे पत्नी पर हो रहे
अत्याचार के खिलाफ
आवाज उठाने का
अपने अधिकारों के प्रति
सचेत होने का
आवाहन करती , शोध करती
भाषण देती
वाह !! कितनी
ज्वलंत हैं आज ,
"कल" की " भोली" नारी
क्योकी अब समय हैं
औरो को समझाने का ,
नियमावली दूसरो के लिये
नई बनाने का
अपनी कूटनीती को
आवरण विवशता
का पहनाने का
Thursday, February 14, 2008
यादो के गुलदस्ते
गुलाब के फूल की तरह
सुगन्धित है यादें आपकी
आज फिर आपकी यादो के गुलदस्ते से
एक याद को गुलाब समझ कर निकाला
और आप को ही समर्पित कर दिया
आप की चीज़ फिर आप तक पहुँची
और मै जहाँ थी वहीं रही
सहेजती यादो को , आपके वादों को
हमेशा ताजी रहें ये यादे मेरे मन मे
और समय समय पर मै
इन यादो के गुलदस्ते से
एक याद को फिर निकाल कर
आप को दे सकूं
और
जी सकूं अपने सच के साथ
Sunday, February 10, 2008
भावना हैं प्यार बहता है निरंतर
प्यार को बाँधना नही
प्यार मे बंधना सीखो
जिसने भी कोशिश कि है
प्यार को बांधने की
प्यार उससे दूर ही रहा है
पर जो बंधा है प्यार मे
प्यार ने उसको सरोबर किया है
प्यार नहीं है कोई वस्तु
प्यार नहीं है कोई जीव
कि हम तुम उसे बाँध सके
भावना हैं प्यार बहता है निरंतर
जिस को भी सरोबर करता है
वो ही इसको समझ सकता है
बाक़ी तो सब रिश्तो मे बंधते है
प्यार मे जो बंधता है
वो भावना और विश्वास मे
बंधता है
Friday, February 08, 2008
गंधाती सड़क
एक गंधाती सड़क से पूछा
दूसरी गंधाती सड़क ने
क्या बात हैं हम क्यों इतना गंधाती हैं
ये गंध ना डीजल की है , ना पट्रोल की
फिर कहाँ से आती हैं
जवाब दिया दूसरी सड़क ने
अरी बावरी अभी यहाँ से
एक जो गया हैं
अपना परिचय वह
यहाँ सार्वजनिक कर गया है
इस गंध को सालो से हर
सड़क झेल रही है
पता नहीं और कब तक झेलेगी
सबके घरो मे हैं
एक सुलभ शौचालय
फिर भी सडको पर
इनका आना जाना
लगा ही रहता
और सड़के गंधाती रहती है
सड़क = वेश्या
Saturday, February 02, 2008
सौ बातो की एक बात हैं
तुम आये या मैने बुलाया
एक ही तो बात थी
प्याला स्नेह का
तुमने पीया मैने पिलाया
एक ही तो बात थी
तुम क्यो आये
ना मैने पूछा ना तुम ने बताया
एक ही तो बात थी
तुम चले गए
ना मैने रोका ना तुम ने पीछे देखा
एक ही तो बात थी
मैने तुमहें छोडा या तुमने मुझे छोडा
एक ही तो बात है
दिल मेरा टूटा या तुम्हारा टूटा
एक ही तो बात है
प्याला स्नेह का दोनो से छुटा
एक ही तो बात है
ना तुम्हारी जुबां पर नाम है मेरा
ना मेरी जुबां पर नाम है तुम्हारा
एक ही तो बात है
सोच मे मेरी आज भी तुम हो
सोच मे तुम्हारी आज भी मै हूँ
सौ बातो की एक बात हैं
Wednesday, January 30, 2008
बेटर हाफ
नैतिकता बोली अनैतिकता से
तुम क्यो भिन्नाती हो
मेरे पति को सही गलत समझाती हो
मै बहुत हूँ उनके लिये
बाहर तो मै उनको बचाती हूँ
बंद कमरे के अन्दर
जूते खूब लगाती हूँ
इसीलिये तो उनकी बेटर हाफ
मै कहलाती हूँ
Tuesday, January 29, 2008
एक और संवाद
अनैतिकता बोली नैतिकता से
मंडियों , बाजारों और कोठो
पर मेरे शरीर को बेच कर
कमाई तुम खाते थे
अब मै खुद अपने शरीर को
बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
कमाई खुद खाती हूँ
तो रोष तुम दिखाते हो
मनोविज्ञान और नैतिकता
का पाठ मुझे पढाते हो
क्या अपनी कमाई के
साधन घट जाने से
घबराते हों इसीलिये
अनैतिकता को नैतिकता
का आवरण पहनाते हो
ताकि फिर आचरण
अनैतिक कर सको
और नैतिक भी बने रह सको
एक संवाद
अनैतिकता बोली नैतिकता से
क्यो इतना इतराती हो
मेरे प्रेमी के साथ रहती हो
और पति है वह तुम्हारा
बार बार मुझे ही समझाती हो
कभी मेरी तरह अकेले रह कर देखो
अपने सब काम खुद करके देखो
पुरुष को प्यार सिर्फ और सिर्फ
उसके प्यार के लिए कर के देखो
सामाजिक सुरक्षा कवच
पुरुष को तुम बनाती है
समाज मे अनैतिकता तो
तुम भी फेलाती हो
फिर बार बार
नैतिकता का पाठ
मुझे ही क्यो पढाती हो ??
Saturday, January 26, 2008
तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै
पार्वती भी मै
दुर्गा भी मै
सीता भी मै
मंदोदरी भी मै
रुकमनी भी मै
मीरा भी मै
राधा भी मै
गंगा भी मै
सरस्वती भी मै
लक्ष्मी भी मै
माँ भी मै
पत्नी भी मै
बहिन भी मै
बेटी भी मै
घर मे भी मै
मंदिर मे भी मै
बाजार मे भी मै
"तीन तत्वों " मे भी मै
पुजती भी मै
बिकती भी मै
अब और क्या
परिचय दू
अपने अस्तित्व का
क्या करुगी तुम से
करके बराबरी मै
जब तुम्हारे
अस्तित्व की
जननी हूँ मै
तुम जब मेरे बराबर
हो जाना तब ही
मुझ तक आना
पार्वती माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमनी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा , पवित्रता का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
बाजार , वासना का प्रतीक
तीन तत्व , अग्नि , धरती , वायु
Friday, January 25, 2008
गणतंत्र दिवस की सभी को बधाई
तिरंगा
ए मेरे तिरंगे
जब तू लहराता हैं
ओठो पे मुस्कान लाता है
जब तू झुक जाता है
आंखे नम कर जाता है
ना जाने कितनी
भाषाओ , धर्मो , जातियो को
तू देता है एक छाँव
और देता है
एक शान बहुतो को
बन के कफ़न उनका
एहसास ही तेरा
काफी होता है
वंदे मातरम्
महसूस करने के लिये
गणतंत्र दिवस की सभी को बधाई , हमारे देश मे प्रेम और सौहार्द हमेशा फलता फूलता रहें
Saturday, January 19, 2008
आज तिरंगा हरभजन ने पर्थ मे फेहराया है
जीत का जश्न फिर इंडिया ने मनाया है
जीती नहीं इंडिया क्रिकेट मे
जीती है इंडिया संस्कारों मे
क्या मिला होगा उनको सुख १६ जीतो से
जो सुख हमने इस एक जीत से पाया है
आज तिरंगा हरभजन ने पर्थ मे फेहराया है
Getty Images: Robert Cianflone
Monday, January 14, 2008
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??
देश को आजाद हुए , होगये है वर्ष साठ
पर आज भी जब बात होती है बराबरी कि
तो मुझे आगे कर के कहा जाता है
लो ये पुरूस्कार तुम्हारा है
क्योंकी तुम नारी हो ,
महिला हो , प्रोत्साहन कि अधिकारी हो
देने वाले हम है , आगे तुम्हे बढाने वाले भी हम है
मजमा जब जुडेगा , फक्र से हम कह सकेगे
ये पुरूस्कार तो हमारा था
तुम नारी थी , अबला थी , इसलिये तुम दिया गया
फिर कुछ समय बाद , हमारी भाषा बदल जायेगी
हम ना सही , कोई हम जैसा ही कहेगा
नारियों को पुरूस्कार मिलता नहीं दिया जाता है
दिमाग मे बस एक ही प्रश्न आता
और
कब तक मेरे किये हुए कामो को मेरी उपलब्धि नहीं माना जाएगा ??
और
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??
Friday, January 04, 2008
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
क्योंकी मै स्त्री हूँ , माँ हूँ , बहिन हूँ , पत्नी हूँ
उनसे तो मै फिर भी लाख दर्जे अच्छी हूँ
जिनका कोई मान समान ही नहीं हैं
जब भी
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
जिन्दगी की लड़ाई मै , आगे ही बढ़ी हूँ
औरो से उपर ही उठी हूँ
नहीं तोड़ सके हैं वह मेरा मनोबल
जो करते है सम्मानित , अपमानित मुझे
क्योंकी मैने ही जनम उनको दिया है
दे कर अपना खून जीवन उनको दिया है
दे कर अपना दूध बड़ा उनको किया है
नंगा करके मुझे जो खुश होते है
भूल जाते है उनके नंगेपन को
हमेशा मैने ही ढका है
Tuesday, January 01, 2008
२००८ से उम्मीद है
२००८ से उम्मीद है बस इतनी
निरस्त्र करे वो हर अस्त्र को
लाये विश्व मे अमन
शांती और स्नेह
फिर कोई इंदिरा ना बने राजीव
फिर कोई बेनजीर ना बने बिलावल
माँ से पाए हर पुत्र
केवल विरासत प्यार की
Thursday, December 27, 2007
झरना बावडी
झरना बह रहा था
बावडी प्यासी थी
सोचा उसने
झरने को अपने मे समा लू
अपनी प्यास बुझा लू
झरने ने अपनी रहा बदली
बावडी को भर दिया
तब बावडी ने जाना
प्यासी वोही नही थी
झरना तो उससे भी ज्यादा
प्यासा था , कही समाना चाहता था
इसीलिये वह खुद बावडी तक आया
उसको भरा और फिर उसको अपने मे
समेट आगे चला
बावडी फिर कही नहीं थी
झरना भी विलुप्त हो गया था
बस बह रही थी
एक नदी प्यार की
Wednesday, December 26, 2007
सच की टीस झूठ का दर्द
सच मे टीस होती है
झूठ मे दर्द होता है
फिर भी लोग
झूठ बोलते है
खुद को टीस और
दूसरो को दर्द देते है
Monday, December 24, 2007
काई
रिश्तों के ऊपर
जब काई आजाती है
रिश्ते सड़ जाते है
लोग फिर झूठ बोल कर
खुद को बचाते है
और भ्रम मे रहते है
की उन्होने रिश्तों को
बचा लिया
रिश्ता तो कबका
दम तोड़ चूका होता है
काई के नीचे
झूठ और अविश्वाश कि गंध से
काई से अच्छे से अच्छा भी
हो जाता है बुरा
ये कविता अपने ओरिजनल फॉर्म मे इंग्लिश मे है और काफी लंबी हैं ।
Sunday, December 23, 2007
बस यूं ही , बस ऐसे ही
तुम्हारे गुनाह की सजा
की मुकर्र हमने
करके माफ़ तुमको
तुम बस यूं ही गुनाह
करते रहो
हम बस ऐसे ही माफ़
करते रहेगे
Thursday, December 20, 2007
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ -- भाग 2
पढ़ लिख कर नौकरी की
आज्ञाकारी पुत्री बन कर विवाह किया
आज्ञाकारी पुत्रवधू बन कर वंशज दिया
और अब सहिष्णु पत्नी बनकर
पति की गलतीयों पर पर्दा डालती हूँ
मै खुद क्या हूँ , मेरा अस्तित्व क्या है
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ
______________________
एका एक आईना दिखा मुझे
और आज्ञाकारी पुत्री का चोला पहने
दिखी एक लड़की जिसने अपनी शादी मे
लाखो खर्च करवाये अपने पिता के
जिसने पाया एक पति ,पिता के कमाए हुये धन से
और आज्ञाकारी पुत्रवधू का चोला पहने दिखी एक औरत ,
जिसने ससुर के पैसे से मकान अपना ख़रीदा ,
अपने मकान को, घर पति के
माता पिता का ना बनने दिया
और सहिष्णु पत्नी का चोला पहने दिखी
एक विवाहिता , जिसने अपने पति को
हमेशा ही एक सामाजिक सुरक्षा कवच समझा
___________________________________
इससे पहले कि आइना और कुछ दिखता
मेरी महानता का आवरण और उतरता
कोई देख पता कि मै भी केवल एक साधारण स्त्री हूँ
जो केवल अपने स्वार्थ के लिये जीती है
मैने आइने पर फिर एक पर्दा डाला
___________________________________
दो चुटकी सिंदूर माँग मे भरा
ससुर के पैर छुये
पिता को कुशलता का समाचार दिया
और पति के साथ उसकी लंबी कार मे
बेठ कर दूसरा या तीसरा हनीमून मनाने
मै चल पडी ।
पति के पर - स्त्री गमन को
वासना कह कर , पुनेह उससे संबंध बनाने के
निकृष्टतम समझोते को करने
ताकि ऐशोआराम से बाक़ी जिन्दगी
अपनी महानता का गुणगान करते
सुनते बीते
Wednesday, December 19, 2007
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ
पढ़ लिख कर नौकरी की
आज्ञाकारी पुत्री बन कर विवाह किया
आज्ञाकारी पुत्रवधू बन कर वंशज दिया
और अब सहिष्णु पत्नी बनकर
पति की गलतीयों पर पर्दा डालती हूँ
मै खुद क्या हूँ , मेरा अस्तित्व क्या है
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ