चुटकियाँ जो काटते हैं
शालीनता का मुलम्मा ओढ़ कर
वो भूल जाते हैं
की पाँच उँगलियों की छाप
हर मुलम्मे को उतार देती हैं
और रह जाता हैं नंगा शरीर
और उससे भी ज्यादा नंगा मन
कपडे बस तन ढकते हैं
कपड़ो मे मन ढकने की ताकत नहीं होती
सभ्यता अगर कपड़ो से आती
तो हर सफेदपोश सभ्य ही होता
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चुटकियाँ
यादो का कबाड़
मेरे साथ बिताये पल
तुमको याद नहीं होगे
पर शायद याद होगा
वो चाबी का गुच्छा
वो दो आम
वो आईस क्रीम
वो किताबे
जो मै तुम्हारे लिये लाई थी
वो शर्ट जो तुमने मुझसे
अपने लिये खरीदवाई थी
वो कालीन जो तुमने
मुझ से मंगवाया था
और
वो गमला जो पैंट करके
अपने हाथो से तुमने मुझे दिया था
या वो किताब जो तुम मेरे लिये लाये थे
या फिर कहीं यादो मै होगी वो
कविता जो तुमको पसदं थी
और
तुमने मुझे चिट्ठी भेज कर पढ़वाई थी
और
मैने अपनी हस्त लिपि मै लिख कर
उसको फ्रेम जड़वा कर तुमको
वापस भिजवाई थी
अब ये सब तो जरुर याद होगा तुमको
चाहे मेरे साथ बिताये पल याद हो ना हो
भौतिक चीजों का यही फायदा होता हैं
कहीं न कहीं कबाड़ की तरह
हमेशा साथ तो रहती हैं
साथ बिताये पलो का क्या
गुज़रा वक़्त होते हैं
कभी वापस नहीं आते
बस ऐसे ही
कविता अगर बनती होती शब्दों से
तो हर लेखक कवि होता
कविता के लिये शब्द नहीं
भाव चाहिये
और भाव के लिये
कोई भाव देने वाला चाहिये
दूरियाँ कमजोरियाँ मजबूरियाँ
मजबूरियाँ
नहीं
कमजोरियाँ
लाती हैं संबंधो मे
दूरियाँ
रिश्ता
कोई भी
कैसा भी
क्यूँ ना हो
डोर हैं
बस नेह की
कमजोरियां
उसको तोड़ती हैं
और
मजबूरियों की गांठे
नहीं जोड़ सकती
कोई भी रिश्ता
जो टूट गया हैं
कमजोरियों से
हमे तुम्हारा प्यार नहीं तुम्हारा कर्तव्य चाहिये
पुरानी पीढी बोली
नयी पीढी से
तुम क्या जानो
हमने क्या क्या किया हैं अपने
माता पिता के लिये
अब अगर करनी को कथनी का
साक्ष्य चाहिये
तो करनी और कथनी के अन्तर को
हर पुरानी पीढी
नयी पीढी को
समझाती ही रहेगी
श्रवण कुमारो की तादाद
पीढी दर पीढी
साक्ष्य के लिये
धूल भरे रास्तो पर
चलती रहेगी
बच्चे कभी जवान नहीं
सीधे बूढे ही बनेगे
और हर नयी पीढी के कर्मो को
पुरानी पीढी रोती रहेगी
हमने तुम्हे पैदा किया
तुम हमको ढोते रहो
क्युकी हमे तुम्हारा
प्यार नहीं तुम्हारा कर्तव्य चाहिये
सबके लिये क्यूँ नहीं हैं
कम उम्र विवाहिता
माँ नहीं बना चाहती
समाज कहता हैं
नहीं गर्भपात नहीं करवा सकती
कम उम्र अविवाहिता
माँ बनना चाहती हैं
समाज कहता हैं
नहीं गर्भपात करवा दो
बच्चे का आना
खुशी अगर हैं
माँ बनना खुशी अगर हैं
तो सबके लिये क्यूँ नहीं हैं
{ बालिका वधु सीरीयल की आज की कड़ी देखकर बस यही समझ आया }
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सप्तपदी अधूरी ही रही
पहला कदम मजबूर हुए तुम
दूसरा कदम दूर हुए तुम
तीसरा कदम ओझल हुए तुम
चौथा कदम बिसर गए हम
और
सप्तपदी अधूरी ही रही
बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं
कह कर कब तक
बेटी को बेटे से कमतर मानोगे
और
कब बेटी को सिर्फ़ और सिर्फ़ इस लिये चाहोगे
कि वो बेटी तुम्हरी हैं
हर समय बेटे रूपी कसौटी पर
क्यों बेटियों के हर किये को
कसा जाता हैं
और कब तक बेटियों को
अपना खरा पन
बेटे नाम कि कसौटी पर
घिस घिस कर
साबित करना पडेगा
कुछ इतिहास हमे भी बताओ
कुछ कारण यहाँ भी दे जाओ
बेटो ने ऐसा क्या किया
जो बेटी को बेटे जैसा
तुम बनाते जाते हो
और उसके अस्तित्व को
ख़ुद ही मिटाते जाते हो
या
बेटे जैसा कह कर
अपने मन को संतोष तुम देते हो
बेटा और बेटी
दोनों अंश तुम्हारे ही हैं
फिर जैसा कह कर
एक आंख को क्यूँ
दूसरी से नापते हो
बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
बेटियाँ बस बेटियाँ होती हैं
ईश्वर बस बेटी न देना
लडकियां इतना कैसे लड़ लेती हैं
कैसे अपने लिये हर जगह
जगह बना लेती हैं ??
कैसे जीतना हैं उनको
अपना मिशन बना लेती हैं ??
कैसे कम खाना खा कर भी
सेहत सही रहे ये जान लेती हैं ??
बहुत आसन हैं
जब माँ के पेट मे होती हैं
तभी से सुनती हैं
माँ की हर धड़कन कहती हैं
इश्वर लड़की ना देना
जो कष्ट मैने पाया
वो संतान को पाते ना देख पाउंगी
हे विधाता बेटी ना देना
बस यही सुन सुन कर नौ महीने मे
माँ के खून के साथ
सरवाईवल ऑफ़ द फीटेस्ट
की परिभाषा
को जीती हैं लडकियां
और
जिन्दगी की आने वाली लड़ाई के लिये
अपने को तैयार कर लेती हैं
हर सफल लड़की के पीछे
होती हैं एक माँ की
कामना की
ईश्वर बस बेटी न देना
कमेंट्स देना की इच्छा हो आए तो यहाँ जाए ईश्वर बस बेटी न देना
अनैतिकता बोली नैतिकता से
अनैतिकता बोली नैतिकता से
मंडियों , बाजारों और कोठो
पर मेरे शरीर को बेच कर
कमाई तुम खाते थे
अब मै खुद अपने शरीर को
बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
कमाई खुद खाती हूँ
तो रोष तुम दिखाते हो
मनोविज्ञान और नैतिकता का
पाठ मुझे पढाते हो
क्या अपनी कमाई के
साधन घट जाने से
घबराते हों
इसीलिये
अनैतिकता को नैतिकता का
आवरण पहनाते हो
ताकि फिर आचरण
अनैतिक कर सको
और
नैतिक भी बने रह सको
पाना खोना
पाने को पा कर खोना
एक उपलब्धि होती हैं
खोने के डर को जीतना
भी एक उपलब्धि होती हैं
पाया ना होता तो
खोया कैसे होता
अभिनव नजदीकियाँ शाश्वत दूरियाँ
ना करना कामना
नज़दीकियों की
दूरियाँ भी
नज़दीकियों से ही आती हैं
वैसे कभी कभी
उनकी दूरियों मे भी
उनकी नजदीकियाँ ही
नज़र हमे तो आती हैं
अभिनव नजदीकियां ही
होती हैं शाश्वत दूरियाँ
जिन्दगी बीत रही हैं
दूर जाने की मज़बूरी
ना मिल पाने की मज़बूरी
कमजोरियों को मज़बूरी बना देना
थी उनकी मज़बूरी या कमजोरी
जिन्दगी बीत रही हैं
समझने मे मेरी
फलसफा
किसी ने कहा
जिन्दगी एक फलसफा हैं
शायद इसीलिये
फल की कामना नहीं करनी चाहिये
सफा होने मे देर नहीं होगी
खेल
जिन्दगी की धुप छावं मे
खेल वो खिलाते रहे
हम खेलते रहे
एक बार ही बस
खेल था खेला हमने
और खेल खेलना
वो भूल गए
मै वही रहूंगी जहाँ थी
दूसरो की जिन्दगी संवारने के
खेल मे अपनी जिन्दगी से
जब खेल चुको
तो मुझ तक वापस आ जाना
और अपनी जिन्दगी संवार लेना
मै वही रहूंगी जहाँ थी
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला
मुस्लिम , सिख , ईसाई
और हिंदू ?
धर्मं नहीं हैं "हिंदू"
हिंदुस्तान मे
हिंदू यानि
हिंदुस्तान की सभ्यता और संस्कृति
हिंदू यानि सर्वधर्म समन्वयता
हिंदू यानी सर्वधर्म सहिष्णुता
पाकिस्तान मे हिंदू यानी एक धर्म
इटली मे हिंदू यानी एक धर्म
लन्दन मे हिंदू यानी एक धर्म
पर हिंदुस्तान मे हिंदू
एक जीवन शैली
एक आस्था
एक विश्वास
आत्मीयता का एक पल
कौन छीन सकता हैं हमसे
नियतिबद्ध हमारी आत्मीयता के पलो को
छोटे लेकिन जिन्दगी से लबालब पल
जिनसे बदल गयी हमारी जिंदगी
सदा के लिये
वो पल जिन्होने समझाया
की अस्वीकृति नहीं बदल सकती हैं
प्यार को भावना को
पल की स्वीकृति से ही
बदल जाती हैं जिन्दगी
तुमने पल को स्वीकार किया
मैने पल को स्वीकार किया
हमारी आत्मीयता के उस एक पल को
और जिन्दगी को जी लिया उस एक पल मे
मै अपनी धरती को अपना वोट दूंगी आप भी दे कैसे ?? क्यूँ ?? जाने
शनिवार २८ मार्च २००९
समय शाम के ८.३० बजे से रात के ९.३० बजे
घर मे चलने वाली हर वो चीज़ जो इलेक्ट्रिसिटी से चलती हैं उसको बंद कर दे
अपना वोट दे धरती को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिये
पूरी दुनिया मे शनिवार २८ मार्च २००९ समय शाम के ८.३० बजे से रात के ९.३० बजे
ग्लोबल अर्थ आर { GLOBAL EARTH HOUR } मनायेगी और वोट देगी अपनी धरती को ।
इस विषय मे ज्यादा जानकारी यहाँ उपलब्ध हैं ।
इसके आगे क्या हुआ , यहाँ पढे
सांझा ब्लॉग पर एक पोस्ट आयी
पोस्ट मे एक टिप्पणी आयी
टिप्पणी मे अपशब्द आये
जो लावण्या को नहीं भाये
अपने लिये होते तो भूल भी जाती
माँ के लिये थे तो भूल ना पायी
तुंरत लावण्या ने एक पोस्ट बनाई
सांझे नहीं निज ब्लॉग पर लगाई
अपनी माँ के प्रति दिये अपशब्दों
पर आपत्ति जतायी
निज का ब्लॉग था , अपनी माँ थी
आपत्ति भी अपनी थी
इसके आगे क्या हुआ , यहाँ पढे
व्हाट अन आईडिया सर जी
रिश्ता
होती हैं बेइमानी उसी रिश्ते मे
जिस रिश्ते का कोई नाम होता हैं
अनाम ही रहने दो हर रिश्ता
ईमानदारी से निभ तो जायेगा
जीवन की त्रिवेणी
तुम , मै
हम
जीवन
-------
रास्ता , मंजिल
पतझर , बहार
जीवन
--------------
दोस्त , दुश्मन
पाना , खोना
जीवन
मेरे मन की कामना
होली या फागुन
लाये बस हँसी ठिठोली
अबीर गुलाल से रंग जाये
सबके मन और तन
दूर हो कालिमा आतंक कि
होली के रंगों से
बस यही हैं कामना
मेरे मन की
हिन्दी ब्लोगिंग की क्लास
हिन्दी ब्लोगिंग की क्लास मे
नैतिकता का पीरियड था
सीनियर सिटिज़न पढा रहे थे
सीनियर सिटिज़न पढ़ रहे थे
ब्लैक बोर्ड पर नारी के
अर्ध नग्न चित्र थे
सब विद्यार्थी ताली बजा रहे थे
चित्र समझ ना आने पर
उसकी डिटेल मे जा रहे थे
अब नैतिकता का प्रश्न हो !!
नारी शरीर पर बात ना हो ??
कुँवारी कैसे स्त्री बनती हैं
जब तक अधेड़ उम्र के
ब्लॉगर समझे और समझायेगे नही
यौन शिक्षा का प्रचार क्यूँ
ग़लत हैं भारत मे
इस विषय पर चर्चा कैसे कर पायेगे ??
हर प्रश्न का जवाब शिक्षक दे रहा था
जहाँ जहाँ जरुरत थी प्रतीकात्मक हो रहा था
नारी को घर मे ही रहना था
बाहर क्यूँ आयी
अब बाहर आयी है तो नग्न उसको कहो
बार बार शास्त्रार्थ करने को कहता था
अब शास्त्रार्थ कौन करता
सब तो ताली बजा रहे थे
एक दो नटखट बच्चो ने
कक्षा मे झाँका तो
केवल वयस्कों का बोर्ड लगा पाया
अब नारी देह पर बात केवल
व्यसक ही भारत मे करते हैं
रिटायर होने की सीमा हो जाए
तब भी इस विषय मे
बच्चो की तरह पढ़ते हैं
और ताली भी बजाते हैं
नग्न औरत के चित्र
इन्टरनेट पर जो लगाते हैं
स्रोत का नाम देना भी भूल जाते हैं
चोरी जो करते हैं
चोरी गलत काम हैं
बार बार वही दोहराते हैं
और बंद दरवाजो के पीछे ही नहीं
खुले आम ब्लॉग पर
नग्न नारी को निहारते
disclaimer is kavita kaa kisi jeenda yaa murda blog post sae koi laena daena nahin haen
कमेन्ट यहाँ करे
संस्कृति और संस्कार
जो इतिहास पढ़ते नहीं
इतिहास बनाते हैं
इतिहास पढ़ना यानि
दूसरो कि बनी लकीरों पर चलना
लकीर सीधी तो सीधी चाल
लकीर टेढी तो टेढी चाल
अपना क्या ? , बस लकीर पीटना
संस्कृति
लकीरों और इतिहास मे नहीं हैं दर्ज ।
संस्कृति ,
बसती मन मे
मिलती हैं कोख मे
और
लोग खोजते हैं संस्कृति को
किताबो मे
शोलोको मे
उद्धरण मे
सांख्यिकी मे
सर्वेक्षण मे
गीता मे
बाइबल मे
कुरान मे
सब कहते हैं
माँ देती हैं संस्कार
जबकि सत्य ये हैं
कि माँ देती हैं संस्कृति
संस्कार और संस्कृति मे
होता हैं फरक बहुत
संस्कृति से संस्कार मिल सकते हैं
पर संस्कार से संस्कृति
ना बनती हैं ना बिगड़ती हैं
नाम इतिहास मे दर्ज करना हैं
तो लकीर एक नयी बनाओ
जिस पर चल कर
अपनी संस्कृति से
अपने संस्कार तक जाओ
संस्कृति और संस्कार
वही इतिहास मे नाम दर्ज कराते हैं
जो इतिहास पढ़ते नहीं
इतिहास बनाते हैं
इतिहास पढ़ना यानि
दूसरो कि बनी लकीरों पर चलना
लकीर सीधी तो सीधी चाल
लकीर टेढी तो टेढी चाल
अपना क्या ? , बस लकीर पीटना
संस्कृति
लकीरों और इतिहास मे नहीं हैं दर्ज ।
संस्कृति ,
बसती मन मे
मिलती हैं कोख मे
और
लोग खोजते हैं संस्कृति को
किताबो मे
शोलोको मे
उद्धरण मे
सांख्यिकी मे
सर्वेक्षण मे
गीता मे
बाइबल मे
कुरान मे
सब कहते हैं
माँ देती हैं संस्कार
जबकि सत्य ये हैं
कि माँ देती हैं संस्कृति
संस्कार और संस्कृति मे
होता हैं फरक बहुत
संस्कृति से संस्कार मिल सकते हैं
पर संस्कार से संस्कृति
ना बनती हैं ना बिगड़ती हैं
नाम इतिहास मे दर्ज करना हैं
तो लकीर एक नयी बनाओ
जिस पर चल कर
अपनी संस्कृति से
अपने संस्कार तक जाओ
चलो ज़िन्दगी का जशन मनाये
कभी बिना कारण मुझे कुछ लिखो
कभी बिना कारण मुझे कुछ कहो
कभी बिना कारण मेरे साथ रहो
कभी बिना प्यार किये भी कहो की करते हों
कुछ करने के लिये हमेशा कारण क्यो चाहिये
और किसी कारण ही कुछ क्यो करना चाहिये
तुम हों
मै हूँ
चलो ज़िन्दगी का जशन मनाये
अपनी अपनी आत्मा के सच को स्वीकार ले
So Let Us Celebrate The Life
Some Times Write To MeEven When There Is Nothing To Write
Some Times Call Me
Even When There Is Nothing To Say
Some Times Be With Me
Even When There Is No Reason
Some Times Say You Love Me
Even When You Don't
Why Always Do Everthing
With Reasoning
Why Always Do Everything
For A Reason
I Am There
You Are There
So Let Us Celebrate The Life
By Being Our True Self
ना किया हो इजहार अगर बसंत पर , तो कर लो वलेंटाइन डे पर
वैलेंटाइन डे हो या हो बसंत
हम तो प्यार का हर दिन
मनायेगे ज़ोर शोर से
जितना जितना बढेगा आतंकवाद
जितना जीतना दूर हमें धर्म करेगा
उतना उतना जरुरी होगा
बार बार मानना दिन
बसंत और वलेंटाइन का
जो करते हैं विरोध मोहब्बत का
दे जवाब मेरे एक सवाल का
जो मुहब्बत ना होती तो
वो क्या इस दुनिया मे होते ?
मोहब्बत से ही ये दुनिया हैं
और
दिन बहुत है कम मुहब्बत के
सो जिस को जिस से मुहब्बत हैं
ना किया हो इजहार अगर बसंत पर
तो कर लो वलेंटाइन डे पर
और भी दो चार दिन ऐसे बनाओ
जब बात हो प्यार कि इकरार कि
जिस देश मे ताज महल हैं
प्यार हैं , विश्वास हैं
उस देश मे नफरत क्यों आयेगी
बसंत और वलेंटाइन से ही सही
प्यार कि खुशबु
फिर मेरे देश को महकाएगी
ना किया हो इजहार अगर बसंत पर , तो कर लो वलेंटाइन डे पर
वैलेंटाइन डे हो या हो बसंत
हम तो प्यार का हर दिन
मनायेगे ज़ोर शोर से
जितना जितना बढेगा आतंकवाद
जितना जीतना दूर हमें धर्म करेगा
उतना उतना जरुरी होगा
बार बार मानना दिन
बसंत और वलेंटाइन का
जो करते हैं विरोध मोहब्बत का
दे जवाब मेरे एक सवाल का
जो मुहब्बत ना होती तो
वो क्या इस दुनिया मे होते ?
मोहब्बत से ही ये दुनिया हैं
और
दिन बहुत है कम मुहब्बत के
सो जिस को जिस से मुहब्बत हैं
ना किया हो इजहार अगर बसंत पर
तो कर लो वलेंटाइन डे पर
और भी दो चार दिन ऐसे बनाओ
जब बात हो प्यार कि इकरार कि
जिस देश मे ताज महल हैं
प्यार हैं , विश्वास हैं
उस देश मे नफरत क्यों आयेगी
बसंत और वलेंटाइन से ही सही
प्यार कि खुशबु
फिर मेरे देश को महकाएगी
कितनी आसान होती ये ज़िन्दगी
अगर दोस्त लबादा ना पहने होते
बहुत आसान होता है
दुशमनो को पहचानना
पर दोस्ती का लबादा
पहने दुशमनो को
कैसे पह्चानु
जो बार बार मिलते है
नये नये भेस मे
और जब जाते है
तो सब एक से लगते है
माँ का आँचल
हर वो आँचल
जहाँ आकर
किसी का भी मन
बच्चा बन जाये
और अपनी हर
बात कह पाए
जहाँ तपते मन को
मिलती हो ठंडक
जहाँ भटके मन को
मिलता हो रास्ता
जहाँ खामोश मन को
मिलती हो जुबा
होता है एक माँ
का आँचल
कभी मिलता है
ये आंचल एक
सखी मे
तो कभी मिलता है
ये आँचल एक
बहिन मे
तो कभी मिलता है
ये आँचल एक
अजनबी मे
ओर कभी कभी
शब्द भी एक
आँचल बन जाते है
इसी लिये तो
माँ की नहीं है
कोई उमर
ओर परिभाषा
मनाई , बंदिश और नियम
जहाँ भी मनाई हों लड़कियों के जाने की
लड़को के जाने पर बंदिश लगा दो वहाँ
फिर ना होगा कोई रेड लाइट एरिया
ना होगी कोई कॉल गर्ल ,ना होगा रेप
ना होगी कोई नाजायज़ औलाद
होगा एक साफ सुथरा समाज
जहाँ बराबर होगे हमारे नियम
हमारे पुत्र , पुत्री के लिये
अधूरी बात , अधूरी आस
हर अधूरे सवाल का जवाब होती हैं कविता
आँख से जो बहा नहीं वो आंसूं होती हैं कविता
कभी कभी जो किसी से कहा नहीं वो शब्द होती हैं कविता
और
कभी किसी ने जो सुना नहीं वो अनुरोध होती हैं कविता
कवि तो बस लिखता हैं
पर भावः हमेशा दूसरो का ही होती है कविता
अधूरी बात को , अधूरी आस को
पूरा करती हैं कविता
शतरंज
सब की बिसात बिछी है
किसी का घोडा ढाई घर चलता है
किसी का ऊंट तिरछी चाल से मारता है
किसी का हाथी सीधा ही भिड़ता है
सब को चिन्ता है अपने अपने वजीर की
और सब बचाना चाहते है अपने राजा को
शह और मात के खेल मे
कब बाजी पलट जाये क्या पता
६४ खानों मे ६४ कलाये सबको दिखानी हैं
अपने को सफ़ेद और दूसरो को काला
बता कर बाज़ी जीतनी हैं
जिन्दगी के कुछ जिये पल -- यादे
काश यादे भी
गर्म कपड़ो कि तरह होती
सर्दियों मे निकालते , धूप दिखाते
कुछ दिन उनको फिर पहनते
और फिर गर्मिया आते ही
सहेज कर बक्सों मे बंद कर देते
लेकिन ऐसा कौन कर पाता हैं
एक बार याद , जब कोई बन जाता हैं
तो हमेशा के लिये मन के बक्से मे
बंद हो जाता हैं
ना वो बाहर आ पाता हैं
ना हमे उसे बाहर ला पाते हैं
और जिन्दगी के कुछ जिये पल
दुबारा जीने कि आरजू मे
बिना मौत ही मर जाते हैं
सौ बातो की एक बात हैं
एक ही तो बात थी
प्याला स्नेह का
तुमने पीया मैने पिलाया
एक ही तो बात थी
तुम क्यो आये
ना मैने पूछा ना तुम ने बताया
एक ही तो बात थी
तुम चले गए
ना मैने रोका ना तुम ने पीछे देखा
एक ही तो बात थी
मैने तुमहें छोडा या तुमने मुझे छोडा
एक ही तो बात है
दिल मेरा टूटा या तुम्हारा टूटा
एक ही तो बात है
प्याला स्नेह का दोनो से छूटा
एक ही तो बात है
ना तुम्हारी जुबां पर नाम है मेरा
ना मेरी जुबां पर नाम है तुम्हारा
एक ही तो बात है
सोच मे मेरी आज भी तुम हो
सोच मे तुम्हारी आज भी मै हूँ
सौ बातो की एक बात हैं
यादो की सीढ़ी पर चढ़ कर ही - उम्मीदे नयी हमेशा आती हैं
कुछ यादे ,
साल पुराना लाया हैं
जो नये साल को
उपहार मे वो देने आया हैं
फिर
साल नया एक आया हैं
कुछ उम्मीदे
फिर नयी वो लाया हैं
बीते हुए पल
आने वाले पल
सफर हैं
यादो से उम्मीदों का
उम्मीदे नयी हमेशा आती हैं
यादें उम्मीदें
उम्मीदों को यादें बनते
साल दर साल
हमने देखा हैं
बिता हुआ साल
यादें पुरानी कुछ दे जाता हैं
और आता हुआ साल
उम्मीदे नयी कुछ लाता हैं
यादें उम्मीदें
उम्मीदों को यादें बनते
साल दर साल
हमने देखा हैं
बिता हुआ साल
यादें पुरानी कुछ दे जाता हैं
और आता हुआ साल
उम्मीदे नयी कुछ लाता हैं
आता या बीता
बीता हुआ समय
क्या कभी बीतता हैं ?
अगर बीतता हैं
तो फिर याद क्यूँ आता हैं ?
बीता हुआ समय
अगर याद आता हैं
तो बीता हुआ
फिर क्यूँ कहलाता हैं ?
आता या बीता
समय शायद
कहीं नहीं जाता हैं
बस साल बदल जाता हैं
अंश नहीं हो तुम मेरा
इसे विधि का विधान कहूँ
या विधि की क्रूरता
अंश नहीं हो तुम मेरा
पर तुम्हारे आने का
कारण मै ही हूँ
"काश्वी" हो तुम
रौशनी ही दोगी सब को
उनको भी जो तुम्हे
इस दुनिया मे सिर्फ
इसी लिये ले आये
की बचा रहे उनका
वोह रिश्ता जिसका " नाम " है
इसी लिये तो
मै तुम्हे
"नियती की बच्ची"
कहती हूँ क्योकि
तुम प्यार की नहीं
समझोते की निशानी हो
और समझोतो से
रिश्तों को बचाया जा सकता है
पर रिश्तो को "जीया" नहीं जा सकता
फिर क्यों अंधेरे रास्तो पर दीये रखना हम भूल जाते है
जिन्हे अपने घर से ज्यादा
दूसरो के घर भाते है
जाते तो बहुत ख़ुशी से हें
पर फिर लौट नहीं पाते है
और किलस कर रह जाते है
जब
कभी व्यंग से कभी आदर से
घरवाले उन्हे "एंन आर आई "बुलाते है
"एंन आर आई" बना कर
पराया उन्हे हम करते जाते है
और फिर उनसे ही उम्मीद
क्यों हम लगाते है
कि हमारी योजनाओं मे
पैसा वह लगाएगे
मातृ भूमि का कर्ज़
वह चुकायेगे
अपनी गलतीयों को
कब तक अपने बच्चो पर हम डालेगे
आज़ाद हुए तो सालो हों गये
बच्चो को आजादी
कब हम दिलवा पाएगे
पराये देश से
कब उन्हे वापस घर ला पाएगे
क्यों नही अपने घरो मे
कुछ काम और हम बढाते है
उन्हे वापस बुलाने के लिये
हम सढ़क क्यों नयी नही बनाते है
बच्चे तो हमेशा ही
रास्ता भटक जाते है
फिर क्यों अंधेरे रास्तो पर
दीये रखना हम भूल जाते है
चाहना पाना देना मांगना
कुछ पाने के लिये चाहते हैं
कुछ सिर्फ़ चाहने के लिये चाहते हैं
जो सिर्फ़ चाहने के लिये चाहते हैं
वही सब कुछ पाते हैं
पाने के लिये चाहना
और
चाहने के लिये चाहना
अन्तर हैं
एक मे हम मांगते हैं
और
एक मे हम देते हैं
मांग के पाया तो क्या पाया
और
मांगने पर दिया तो क्या दिया
९९ का फेर ख़तम !!
Poems (पसंद 100 की) , वर्ग- कला, (सक्रियता क्रं० - 43, 21 चिट्ठों की 60 प्रविष्टियों में उपस्थिति
पिछले कई दिन से चिट्ठाजगत पर पसंद का आकडा ९९ के फेर मे था आज देखा तो सैकडा हो गया हैं । इस ब्लॉग को चिट्ठाजगत पर पसंद करने वालो को धन्यवाद ।
अंत और नवजीवन
जो मन मे होते है
वोही शब्द मन को भाते है
जो मन को भाते है
वोही मन को भरमाते है
मेरे शब्द नहीं भरमाते तुमको
इसी लिये वो भाते है तुमको
खोलो और दरवाजे
मिलेगे बहुत सुंदर लोग
बहुत सुंदर शब्द
या अपने ही शब्दो को
अपना दोस्त बनाओ
लिखो औरो को भी
दिखाओ , शायद
वह शब्द किसी को
वह दे जो तुम कहते हों
मिला है तुमको
मेरे शब्दो मे
जहाँ अंत आता है
नवजीवन वहीँ होता है
अभिनव हो तभी है प्यार
पर सबसे कम समझा गया
शब्द है प्यार
सबसे ज़्यादा चाहा गया
पर सबसे कम जीया गया
अहसास है प्यार
उससे पाने से ज्यादा
उसको देने मे था प्यार
उसके साथ रहने से ज़्यादा
उससे दूर होने मे है प्यार
जिये हुए को आत्मसात
करने मे है प्यार
महसूस करने को
तुम से अभिव्यक्त करने मे है प्यार
पति को जो पुरुष बनाये
पत्नी को जो स्त्री बनाये
वह आत्मिक मिलन है प्यार
पुरुष की ज़रूरत हो
स्त्री का समर्पण हों
तो उस अनाम रिश्ते का
नाम है प्यार
पुरुष को जो पुरुष बनाए
स्त्री को जो स्त्री बनाये
वह संपूर्ण कर्म है प्यार
सच कहने की जो ताकत दे
सच स्वीकारने की जो शक्ति दे
वह भावना है प्यार
अभिनव हो तभी है प्यार
बाकी सब है व्यवहार
एक और संवाद
अनैतिकता बोली नैतिकता से
मंडियों , बाजारों और कोठो
पर मेरे शरीर को बेच कर
कमाई तुम खाते थे
अब मै खुद अपने शरीर को
बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
कमाई खुद खाती हूँ
तो रोष तुम दिखाते हो
मनोविज्ञान और नैतिकता
का पाठ मुझे पढाते हो
क्या अपनी कमाई के
साधन घट जाने से
घबराते हों इसीलिये
अनैतिकता को नैतिकता
का आवरण पहनाते हो
ताकि फिर आचरण
अनैतिक कर सको
और नैतिक भी बने रह सको
ज़िन्दगी के उस पार
आती हुई हर सांस
ले जाती है एक पल
उम्मीदो का
जाती हुई हर सांस
ले जाती है एक पल
जीवन का
संबंध
खतम हो रहे हैं
ज़िन्दगी के उस पार
भी जीवन है
जो
बुला रहा है मुझे
शब्द बन गये है एक सेतु
शब्द
बन गये है
एक सेतु
वह लिखती है
दर्द बहाने के लिये
वह पढ़ता है
दर्द बहाने के लिये
उसके दर्द मे
तकलीफ है
इस लिये
उसके शब्द
है कड़वे पर सच
उसकी पीड़ा
है अनकही
नहीं है शब्द
पास उसके
ना कड़वे ना सच
खड़े है दोनो
पीठ कीये
उस सेतु पर
जिसे उसके
शब्दो ने बनाया है
ओर बाँट रहे है
अनकहा
दर्द के कमरे मे तालाबंद होती हैं खुशियाँ
हर दर्द आप को देता हैं एक कारण
खुशियाँ ढ़ूढ़ने का
शायद खुशियाँ बंद होती हैं
उस कमरे मे जिसका नाम है दर्द
और हम हमेशा डरते हैं
इस कमरे का ताला खोलने से
इसीलिये हम वंचित रह जाते हैं
खुशियों से
मैने ये ताला खोला
और अपनी खुशियों को पाया
मेरी खुशियों का नाम हैं प्यार
इंतज़ार शब्दो का
जिन शब्दो से
आये ये शब्द
वह शब्द ही ना आये
इन शब्दो को देखने
आज भी इंतज़ार है
इन शब्दो को
उन शब्दो का
हो सकता है
आवाज दे कोई
अगर तुमको
ना वक़्त हो
फिर भी
वक़्त निकालो
ना मालूम क्यो
कोई तुमको
आवाज देता है
हो सकता है
उसके पास
और वक़्त ना हो
विष विरह चौरा और त्रिया चरित
राधा ने प्रेम मे विरह पाया
तुलसी ने प्रेम मे चौरा पाया
विष विरह चौरा
यही मिलता है प्यार मे नारी को
फिर भी है सब कहते है
त्रिया चरित करती है नारी
हिंदू यानी कट्टरपंथी ??
हिंदू यानी कट्टरपंथी
बिल्कुल सही
तभी तो
हर रिश्ते को कट्टरता से
हिंदू ही निभाता हैं
हर धर्म को अपने मे
हिंदू ही समाता हैं
बिना ख़ुद को बदले
बिना दूसरो को बदले
सर्वधर्म सहिष्णु
सापेक्ष नहीं निरपेक्ष
हिंदू ही कहलाता हैं
हिंदुस्तान की नींव हैं हिंदू
नींव कौन हिला पाया हैं
संस्कार कौन बदल पाया
भाई कहा तो भाई माना
हिंदू होने का मतलब
बस हमे इतना ही
हमारे संस्कारो ने हमको समझाया हैं
अच्छा ही हैं कि कट्टरवादी
हमारे संस्कारो ने हमे बनाया हैं
एक सामाजिक बदलाव लाने के लिये अपने मे बदलाव लाना जरुरी हैं
मै आज ये शपथ लेती हूँ कि वही करुगी जो सच और सही हैं । मेरे लिये कुछ भी करके कुछ भी पाना उतना महतवपूर्ण नहीं हैं जितना की मैने किस रास्ते पर चल कर वो पाया । एक सामाजिक बदलाव लाने के लिये अपने मे बदलाव लाना जरुरी हैं और आज से मै अपने मे बद्लाव लाऊंगी । जिन्दगी कोई मजाक नहीं हैं इस लिये मै कुछ भी बेमकसद नहीं करुगी ।
For me the means to achieve the desired end is more important then the desired end.
मेरे मौला अब तो सुन
कि अपने प्यारे जिहादियों को
अपने पास बुला लो
क्यूँ दस दस पाँच पाँच कर के बुलाते हो
एक साथ बुला लो
सारा सबाब एक साथ है इनको दे दो
तुम्हारे बंदे हैं
बार बार बिचारे
बन्दूक उठाते हैं
मुह कि खाते हैं
और मर जाते हैं
हम भगवान् के बंदे हैं
वो अल्लाह के बंदे हैं
भगवान् हमारी सुनता नहीं
या अल्लाह तू ही सुन
नमाज कह मै नमाज पदूगी
हज को भी जाउंगी
रोजा भी रखूगी मजार पर चद्दर भी चढ़ाऊगी
शहादत या हादसा
जब भी एक आम आदमी मरता हैं
मौत उसकी हादसा होती हैं
क्यूँ शहादत कर दर्जा हम
कुछ को देते हैं
और
कुछ की मौत को
बस हादसा कहते हैं
हर मरने वाला
किसी न किसी कर
कुछ न कुछ जरुर था
इस देश कर था या उस देश का था
पर आम इंसान था
शीश उसके लिये भी झुकाओ
याद उसको भी करो
हादसा और घटना
मत उसकी मौत को बनाओ
एक नेता बनवाना हैं
नहीं था ये हमला मुंबई पर
ये हमला था भारत पर
जो शहीद हुए
वो भारत के थे
कब तक हम अपने
लालो , होनहारों को
शहीद होता हुआ देखेगे
कभी कारगिल के नाम पर
तो कभी आतंकवाद के नाम पर
क्यूँ नहीं एक बार फिर से हम
खुल कर युद्ध करते हैं
उनसे जो हर बार दामन
अपना पाक साफ़ दिखाते हैं
क्यूँ हम सहन करते हैं
उन नेताओं को जो
देश को भूल कर देशवासी को भूल कर
बस पार्टी कि बात करते हैं
कभी कभी लगता हैं
ये पार्टी कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं हैं
ये पार्टी हैं गिधो और चीलों कि
जो हर भारतवासी का मांस
नोच नोच कर खा रहे हैं
और पार्टी के नाम पर
जश्न रोज मना रहे हैं
अखबारों मे बड़े बड़े विज्ञापन
अपनी अपनी पार्टी का देते हैं
एक दूसरे को चोर कहते हैं
अगर कहीं नेता बनाने का आर्डर दिया जाता हो
तो मुझे बताओ , एक नेता बनवाना हैं
जो वक्त पर हमारे साथ खडा तो हो
एक दिन हम सब सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करे ।
जिन्दगी के कुछ जिये पल -- यादे
काश यादे भी
गर्म कपड़ो कि तरह होती
सर्दियों मे निकालते , धूप दिखाते
कुछ दिन उनको फिर पहनते
और फिर गर्मिया आते ही
सहेज कर बक्सों मे बंद कर देते
लेकिन ऐसा कौन कर पाता हैं
एक बार याद जब कोई बन जाता हैं
तो हमेशा के लिये मन के बक्से मे
बंद हो जाता हैं
ना वो बाहर आ पाता हैं
ना हमे उसे बाहर ला पाते हैं
और जिन्दगी के कुछ जिये पल
दुबारा जीने कि आरजू मे
बिना मौत ही मर जाते हैं
शब्द कहाँ से लाऊँ वो ?
जो गले मे अटकते है
शूल बनकर दिल को
चुभते है
शब्द
जो कलम से फिसलते है
फाँस बनकर दूसरो को
लगते है
शब्द
जो नहीं भरमाते है
सबको पसंद नहीं
आते है
शब्द
जो मन भाते है
सब को पसंद
आते है
शब्द
जो मन भाते है
वोही भरमाते है
शब्द
जो भावना की
स्याही से
लिखे जाते है
शीतलता दे जाते है
शब्द
कहाँ से लाऊँ वो
जो लाये तुमको
मिलाये हमको
बस ऐसे ही , बस यूं ही
कितनी राते आयी
पर
वह सुबह नहीं आयी
जब बीती शाम
और
बीती रात की
याद ना आयी
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समझोते की चारपाई तुमने बिछाई वो सोई
तुम भी अधूरे उठे वो भी अधूरी उठी
-----------------------------------------
खुद ने कहा , खुद ने सुना
दस्ताने मुहब्बत यूं ही
महसूस किया
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जिन्दगी की धूप छाँव मे धूप ने इतना तपाया
कि छाँव की आदत ही नहीं रही मुझको ।
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पल्ले मे बंधता है अधिकार,
मुठ्ठी मे बंधता है प्यार
मुठ्ठी भर प्यार ही देता है
फिर जिन्दगी संवार
--------------------------
मंदिर मे राधा को पूजते है जो
जिन्दगी मे राधा को दुत्कारते है वो
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धूप मे छाँव मे संग मे साथ मे
मन मे तन मे आस हैं प्यास है
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कभी कभी जिन्दगी मे कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं
जो हमारे नहीं होते पर हम याद उन्हे ही करते हैं
काश ज़िन्दगी भी एक स्लेट होती
जब चाह्ती लिखा हुआ पोछ्ती
और नया लिख लेती
चलो ज़िन्दगी ना सही
मन ही स्लेट होता
पोछ सकती , मिटा सकती
उन जज्बातो को
जो पुराने हो गये हें
पर ज़िन्दगी की चाक तो
भगवान के पास है
और मन पर पड़ी लकीरें हो
या स्लेट पर पड़ी खुरसटें हो
धोने या पोछने से
नहीं हटती नहीं मिटती
पुरानी पड़ गयी स्लेट को
बदलना पड़ता है
विवश मन को
भुलाना होता है
ब्लोगिंग के खेमे
परिवार कि बात सबसे ज्यादा करते है जो
ब्लोगिंग को खेमो मे बाँटते हैं वो
पहले भाषा से बांटा फिर लिंग से बांटा
अब खेमो मे बांटा और कब तक चलेगा ये सब
पता नहीं अब तो वितिष्ना सी होती हैं
इन खेमो से इन खंडो से
और इस दोहरी मानसिकता से
जो फैसला नहीं कर पाती
की उसको जिन्दगी से चाहिये क्या
नमी तुम्हारी आंखो की
मन मे था प्यार होठो पर हँसी
खाली हाथ तुम गये दूर मुझ से
मन मे था पश्चाताप आंखो मे नमी
भूल गए हो तुम
आ कर ले जाओ
हँसी खुशी से रहो
और नमी तुम्हारी आंखो की
मेरी आंखो मे रहे
घुटन
उसे जिसे
बंद खिड़की होने के
एहसास से ही
घुटन होती थी
उसके लिये दरवाजे सब
मैने बंद कर दिये
कह दिया जाओ
जियो अपनी जिंदगी क्योकि
हर बार जब भी
दरवाजा तुम बंद करते थे
मै खिड़की खुली रखती थी
ये सोच कर कि
तुम को घुटन ना हो
पर अब मै थक गयी हूँ
तुम्हारे बंद किये
खिड़की दरवाजो को खोलते
सो अब निर्णय मेरा है
दरवाजा बंद रखने का
बस यूं ही
आपने शब्दों मे बयाँ की
आप से मिल कर हमे जो खुशी हुई
शब्द ही नहीं हैं कैसे बयां करे
बोली यादे
दस्तक देती यादो से पूछा मैने ,
क्यों बारबार बंद दरवाजो को खटखटाती हो ?
क्यों बिन बुलाये हर तीज त्यौहार चली आती हो ?
एक याद बोली ,
मै आती कहा हैं , तुम बुलाती हो
दूसरी याद बोली ,
आती हूँ इसलिये ताकि तुम अकेली ना महसूस करो
फिर तीसरी याद ने कहा ,
मै आती नहीं भेजी जाती हूँ
वो ही मुझे बार बार तुम तक भेजते हैं ,
जो ख़ुद आ नहीं पाते हैं
यादो की दस्तक जारी हैं ,
दिल के बंद दरवाजो पर
ठग्गू के लड्डू , नहीं रह गयी हैं अब कविता , ग्लोबल हो गयी हैं
ठग्गू के लड्डू
नहीं रह गयी हैं अब कविता
कि फुर्सत मे गप से खा जाओ
ग्लोबल हो चली हैं कविता
सो गले मे भी अटकती हैं
हल्के शब्दों से भारी कविता
उफ़ इतनी अभद्रता !!
आंसू भरी होती तो पोछते !!!
आह भरी होती तो समझाते !!!!
लब नयन नक्श होते तो निहारते !!!!!!!!
अब तार्किक को सिणिमान
कहते हैं चिडिमार और
फुर्सत मे चिंतन से कविता और कवि
पर चिरकुटाई मंथन करते हैं
" ना "
खोना पाना
लेना देना
आना जाना
हंसना रोना
इन मे है
समानता
बस एक
सब मे है
एक " ना "
ना कुछ अपना था
ना कुछ अपना होगा
ना कुछ लाये थे
ना कुछ ले जायेगे
फिर क्यो उलझाते है
हम अपने को बार बार
इस "ना" मे
अब समझ आया है मुझे , क्यो हमारा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है
मेरा प्यार भी तुम हो मेरी नफरत भी तुम हो
पर
मै तुम्हारा प्यार भी नहीं हूँ तुम्हारी नफरत भी नहीं हूँ
मेरा विश्वास भी तुम हो मेरा अविश्वास भी तुम हो
पर
मै तुम्हारा विश्वास भी नहीं हूँ तुम्हारा अविश्वास भी नहीं हूँ
मेरा मौन भी तुम हो मेरे शब्द भी तुम हो
पर
मै तुम्हारा मौन भी नहीं हूँ तुम्हारा शब्द भी नहीं हूँ
मेरा आदि भी तुम हो मेरा अंत भी तुम हो
पर
मै तुम्हारा आदि भी नहीं हूँ तुम्हारा अंत भी नहीं हूँ
अब समझ आया है मुझे
क्यो हमारा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है
"पर"
ने "पराया" किया है मुझे
हिन्दी कठपुतली बन कर रह गयी हैं , हिन्दी ब्लोगिंग मे
अपने हम उम्र को जो बुजुर्ग कहते हैं
सारी उम्र बच्चे ही बने रहना चाहते हैं
अपने अंदर के बच्चे को जीवित रखना
आसन नहीं होता पर
हर समय बच्चा बने रहना
भी क्या सही होता ??
ऐसा लगता हैं
जैसे कि आप चाहते हो
सब बस आप पर ही ध्यान दे
आप को ही सहेजे समेटे
और आप इठलाते रहें
तुतलाते रहे
मुहं मे अंगूठा डाल कर
चूसते रहे और
दूसरो को ठेंगा दिखाते रहे
मन मे भ्रम आप ने है पाला
कि आपका ही शायद जन्म सिद्ध अधिकार हैं
दूसरो कि समय असमय खिल्ली उड़ाने का
और जो प्रतिवाद करे
उस पर तोहमत लगाने का
कि उसको हास्य समझ नहीं आता
या उसको तो हँसना ही नहीं आता
किसी कि व्यक्तिगत जीवन शैली को
प्रश्न चिन्ह करने का अधिकार शायद
हिन्दी ब्लॉगर होते ही आप को
मिल जाता हैं
और शायद इसीलिये
हिन्दी कठपुतली बन कर रहगयी हैं
हिन्दी ब्लोगिंग मे
कुछ साहित्यकार हैं कुछ पत्रकार हैं
कुछ पुराने हैं कुछ पुरानो के ताबेदार हैं
डोर से जिन्होने बाँधा हैं हिन्दी कि ब्लोगिंग को
जब मन करेगा वो हिलाएगे
आप ताली ना बजाओ तो चमेली का तैल लगायेगे
अच्छा लिखो तो पैरोडी बनाते हैं
उनको पसंद ना आए तो अपरिपक्व लेखन बताते हैं
कविता विधा नहीं हैं ब्लोगिंग की बार बार वो समझाते हैं
ब्लॉग को चिट्ठा बता कर मेड इन इंडिया का लेबल जो लगाते हैं
कहां जाए वो बेचारे जो केवल और केवल ब्लॉगर हैं
कभी ये क्यूँ नहीं बताते हैं
कफ़न समाज का
पहन कफ़न समाज का
ना जाने कितने रिश्तों को मारा जा रहा है
पहना के कफ़न समाज का
जो सब से ज्यादा देते है दुहाई
समाज की
सब से कम देखा हें
उन्हे ही मानते नियम
समाज का
" कन्यादान "
देखा है विरोध
सती प्रथा का
बाल विवाह का
दहेज़ प्रथा का
कन्या अशिक्षा का
कन्या भूर्ण ह्त्या का
यौन शोशर्ण का
बलात्कार का
पर कभी नहीं देखा
कोई विरोध
" कन्यादान " का
क्यो कोई स्त्री
कभी विवाह मंडप मे
नहीं कहती
"नहीं हूँ मै दान की वस्तु
मुझे दान ना करे "
क्यो कोई पुरुष
कभी विवाह मंडप मे
नहीं कहता
" नहीं ही हूँ मै भिखारी
दान नहीं लूँगा "
कितनी आसान होती ये ज़िन्दगी
कितनी आसान होती ये ज़िन्दगी
अगर दोस्त लबादा ना पहने होते
बहुत आसान होता है
दुशमनो को पहचानना
पर दोस्ती का लबादा
पहने दुशमनो को
कैसे पहचानू
जो बार बार मिलते है
नये नये भेस मे
और जब जाते है
तो सब एक से लगते है
प्यार रिश्तो का मुहताज नही होता
रिश्तो की जमा पूंजी से
जिन्दगी का खाता तो
हमेशा ही खाली था
पर
सुना था की
प्यार रिश्तो का
मुहताज नही होता
फिर क्यों मै
प्यार के सहारे
जिन्दगी की वैतरणी को
पार नहीं कर पायी
दम्पति दिया दिवाली
हर विवाह उत्सव के बाद
होती हैं पूजा
कुल देवता कि
नव दम्पति साथ मिल कर
एक करते हैं बाति दो दियों कि
पर फिर दिवाली पर भूल जाते हैं
बिना बाति को मिलाए ही
दिये जलाते हैं
और इसीलिये
बहुत से दम्पति
शादी को कभी जी ही
नहीं पाते हैं ।
भीड़ तुम और मै
अब एक भीड़ का हिस्सा ही हो तुम
आज फिर भीड़ मे , मै घूमती रही
बस तुमको सिर्फ़ तुमको ही ढूंढ़ती रही
बीतते समय के साथ धुंधला जाता हैं अक्स
शायद इसी लिये भीड़ मे भी अब नहीं दिखते हो तुम
शतरंज
सब की बिसात बिछी है
किसी का घोडा ढाई घर चलता है
किसी का ऊंट तिरछी चाल से मारता है
किसी का हाथी सीधा ही भिड़ता है
सब को चिन्ता है अपने अपने वजीर की
और सब बचाना चाहते है अपने राजा को
शह और मात के खेल मे
कब बाजी पलट जाये क्या पता
६४ खानों मे ६४ कलाये सबको दिखानी हैं
अपने को सफ़ेद और दूसरो को काला
बता कर बाज़ी जीतनी हैं
भगवा नहीं तिरंगा हैं हिंदू
हिंदू
ह से हमेशा
न से नम्रता
द से देता
जी हाँ
हिंदू ही
हमेशा नम्रता से देता आया हैं
सब को अपने मे समाता आया हैं
इतना विशाल हैं हिंदू की जितना भी डालोगे
आँचल का विस्तार उसका उतना ही होगा
केवल और केवल छाँव ही देगा आँचल उसका
भगवा नहीं हैं हिंदू
एक तिरंगा हैं हिंदू
हरे मे है प्यार उसका
उनके लिये जो उससे दूर हो कर
देश नया बनाते हैं
सफ़ेद मे हैं शान्ति उसकी
उनके लिये जो समय असमय
अशांति फैलाते हैं
कभी किसी कट्टर हिंदू से
दोस्ती तो कर कर देखो
कट्टरता से प्यार करेगा तुमको
मर जायेगा पर
तुम पर आंच ना आने देगा
हिंदू यानी कट्टरपंथी ??
हिंदू यानी कट्टरपंथी
बिल्कुल सही
तभी तो
हर रिश्ते को कट्टरता से
हिंदू ही निभाता हैं
हर धर्म को अपने मे
हिंदू ही समाता हैं
बिना ख़ुद को बदले
बिना दुसरो को बदले
सर्वधर्म सहिष्णु
सापेक्ष नहीं निरपेक्ष
हिंदू ही कहलाता हैं
हिंदुस्तान की नींव हैं हिंदू
नींव कौन हिला पाया हैं
संस्कार कौन बदल पाया
भाई कहा तो भाई माना
हिंदू होने का मतलब
बस हमे इतना ही हमारे
संस्कारो ने हमको समझाया हैं
अच्छा ही हैं कि कट्टरवादी
हमारे संस्कारो ने हमे बनाया हैं
धर्मं नहीं हैं "हिंदू"
मुस्लिम , सिख , ईसाई
और हिंदू ?
धर्मं नहीं हैं "हिंदू"
हिंदुस्तान मे
हिंदू यानि
हिंदुस्तान की सभ्यता और संस्कृति
हिंदू यानि सर्वधर्म समन्वयता
हिंदू यानी सर्वधर्म सहिष्णुता
पाकिस्तान मे हिंदू यानी एक धर्म
इटली मे हिंदू यानी एक धर्म
लन्दन मे हिंदू यानी एक धर्म
पर हिंदुस्तान मे हिंदू
एक जीवन शैली
एक आस्था
एक विश्वास
काई
जब काई आजाती है
रिश्ते सड़ जाते है
लोग फिर झूठ बोल कर
खुद को बचाते है
और भ्रम मे रहते है
की उन्होने रिश्तों को
बचा लिया
रिश्ता तो कबका
दम तोड़ चूका होता है
काई के नीचे
झूठ और अविश्वाश कि गंध से
काई से अच्छे से अच्छा भी
हो जाता है बुरा
ये कविता अपने ओरिजनल फॉर्म मे इंग्लिश मे है और काफी लंबी हैं ।
वो मुसलमान हैं मै हिंदू हूँ
वो मुसलमान हैं मै हिंदू हूँ
मेरा धर्म मेरा हैं
उसका धर्म उसका हैं
मेरी आस्था मेरी हैं
उसकी आस्था उसकी हैं
पर देश हमारा एक हैं
मैने कभी उससे नहीं पूछा
क्या तुमको यहाँ कोई तकलीफ हैं
क्यूँ पुछू उसका अपना घर हैं
उसका अपना देश हैं
उसको तकलीफ होगी तो
वो ख़ुद झेलेगा और निपटेगा
लडेगा ख़ुद अपने हक़ के लिये
और लेके रहेगा अपना हक़
अपने घर मे क्या आराम
और क्या तकलीफ
बारबार जो उसकी तरफदारी मे
उठ खडे होते हैं
अहसास वाही उसको कराते हैं
की तुम मुसलमान हो
हमारे घर मे रह रहे हो
तुमको बचाना हमारा धर्म हैं
धर्म की परिभाषा की आड़ मे
मिलकियत वही देश पर दिखाते हैं
जो केवल ईद पर
मुसलमान को गले लगाते हैं
ग़लत होगा जो
हिंदू हो या मुसलमान
देश का कानून ख़ुद निबटेगा
मानवता को शर्मसार जो करेगा
धर्म उसका ख़ुद उसको कचोटेगा
मत याद दिलाओ बारबार की
ईद पर पिछले बम्ब धमाको के बाद
दिवाली हिन्दुओ ने नहीं मनाई थी
और नवरात्रि की मन्दिर मे भगदड
के बाद ईद मुसलमानों ने नहीं मनाई थी
क्युकी सब ने सिर्फ़ और सिर्फ़
तब अपना धर्म निभाया था
धर्म मानवता का
धर्म देश प्रेम का
धर्म भाई चारे का
हिन्दुस्तानी या भारतीय
मेरी सरज़मी हैं हिंदुस्तान
हिन्दुओ का स्थान
फक्र हैं मुझे की मै
हिंदू हूँ , हिन्दुस्तानी हूँ
एक मुसलमान लड़की ने
साड़ी पहन कर
तसवीर अपनी सबको दीखाई
सबकी लाडली बनी और
ताली सब हिन्दुओ ने बजाई
किसी को वो बहादुर और
किसी को वो अपनी बेटी नज़र आयी
उसके तीखे लेखन पर जो करतल ध्वनि
करते नज़र आते हैं अपनी बेटी को
चुप रहने और मीठा बोलने का पाठ पढाते हैं
कहा लिखा हैं की साड़ी
हिन्दुओ की पारम्परिक पोशाक हैं ??
क्या हिंदू चाहते हैं की
उनकी बेटिया बुर्का पहने और
मुसलमानों से ताली पाए
मन्दिर शायद ही रोज मै जाती हूँ
क्युकी मेरा कर्म ही मेरी पूजा हैं
साड़ी ही नहीं हैं
स्कर्ट , जींस , टॉप , गरारा , शरारा
और सूट भी पहनती हूँ
क्या इसीलिये कहा जाता हैं
मै पाश्चात्य सभ्यता की अनुयाई हूँ
और समाज मै अनैतिकता मुझ से आती हैं
जो पाश्चात्य सभ्यता के अनुयाई हैं
जिनके धर्म मे पुजती हैं " वर्जिन मेरी "
वो सबसे ज्यादा परेशान नज़र आते हैं
भारतीय सभ्यता पर पाश्चात्य सभ्यता
के दुश प्रभाव से
हिन्दी हैं भारत माँ के माथे की बिंदी
हिंदू को वो समझाते हैं
जिनके याहां बिंदी
लगाना पाप या कुफ्र हैं
मिशनरी स्कूल मै पढ़ती थी
मिशनरी का मतलब था
एक मिशन से बंधा हुआ
मिशन बच्चो को पढाने का
उनमे शिक्षा का प्रसार करने का
और वही होता था
फिर अब कैसे और क्यूँ
मिशनरी का मतलब बन गया
मिशन बच्चो को धरम के प्रति
जागरूक बनाने का
कही किसी मुस्लिम लड़की ने लिख दिया
मार दो गोली मुसलमानों को
सजदे मै झुक गए हजारो हिंदू सिर
अपनी बेटियाँ आगे ना जाए
दुसरो की बेटियाँ आगे जाए
क्या यही होता हैं हिंदू होना
एक नन को संत उन्होने बनाया
हमने भी नमन किया और
सर माथे उसे बिठाया
पर हमारे भगवान् ढकोसला
हमारा धरम कट्टरवादी
ये भी वही कहते हैं
क्यूँ सुने हम
क्या अब अपने देश मे
हिंदू को पूजा करने के लिये
उनकी आज्ञा लेनी होगी
हिंदुस्तान मे तुम जहाँ
चाहो मस्जिद और चर्च बनाओ
पर एक हिंदू मन्दिर अगर
रोम मे बनाना हो तो
सरकारी परमिशन लाओ
हिंदू सुहागिन का मंगल सूत्र
बस और बस एक जेवर
होता हैं दूसरे देश मे !!
दर्द होता हैं जब
अपमान होता हैं
हमारी संस्कृति का
क्या भारतीय होना
हिन्दुस्तानी होने से अलग होता है
क्यूँ जब भारतीये होने की बात आती हैं
तो सब भारतीये बनने को तैयार हैं
पर हिन्दुस्तानी कहने मे
उनको हिंदू होने की गंध आती हैं
क्यूँ
अपने ही देश मे हिन्दुस्तानी
विदेशी होता जारहा हैं
और भारतीये का चोला पहन
हर विदेशी हिंदुस्तान को
इंडिया बना रहा हैं
झरना बावडी
झरना बह रहा था
बावडी प्यासी थी
सोचा उसने
झरने को अपने मे समा लू
अपनी प्यास बुझा लू
झरने ने अपनी राह बदली
बावडी को भर दिया
तब बावडी ने जाना
प्यासी वोही नही थी
झरना तो उससे भी ज्यादा
प्यासा था , कही समाना चाहता था
इसीलिये वह खुद बावडी तक आया
उसको भरा और फिर उसको अपने मे
समेट आगे चला
बावडी फिर कही नहीं थी
झरना भी विलुप्त हो गया था
बस बह रही थी
एक नदी प्यार की
लाईट लो बिटिया - पत्नी बनकर जीवन लाईट होता हैं
तुम सदियों से लाईट लेते रहे
पत्नी पर व्यंग करते रहे और
सुधिजन संग तुम्हारे मंद मंद हँसते रहे
घर मे हमको लाकर
व्यवस्था के नाम पर
वो सब हम से करवाया
बिना हम से पूछे की
हमारी पढाई गयी चूल्हे मे
तुम्हारी पढ़ाई से तरक्की हुई
हमारे माता पिता का सम्मान
उनके दिये हुए सामान से
तुम्हारे माता पिता का सम्मान
तुम्हे पैदा करने से
हम चाकर तुम मालिक
घर तुम्हारा बच्चे तुम्हारे वंश तुम्हारा
तुम हो तो हम श्रृगार करे
ना हो तो सफ़ेद वस्त्र पहने
हम पर कब तक व्यंग
और फब्तियां कसोगे
उस दिन समझोगे की
जब अपनी बेटी ब्याहोगे
हम तब भी उसको यही समझायेगे
जो हमारी माँ ने हमको समझाया
बिटिया निभा लो जैसे हमने निभाया
समझोते का नाम जिन्दगी हैं
और जिन्दगी जीने का अधिकार
पति का हैं
पत्नी को तो जीवन
काटना होता हैं
लाईट लो बिटिया
पत्नी बनकर जीवन लाईट होता हैं
बस ऐसे ही, बस यूँही
नवरात्रि मे ईद मुबारक भी कहते हैं हम और
धर्म- मज़हब के नाम पर मरते मारते भी हैं हम
संस्कार
ना निकालो मित्र
मन की भडास
वैस ही ज़माने मे गम
कुछ कम नहीं है
कब कुछ हो जाये
और हम से
भी ना मनाई जाये
ईद दिवाली
इस बार
संस्कार कुछ मीठे
मिल कर सब दे जाओ
धर्म की परिभाषा
कभी कभी मन कहता हैं कि आओ सब मिल कर एक साथ विसर्जित कर दे हर धर्म ग्रन्थ को हर मूर्ति को हर गीता , बाइबल कुरान और गुरुग्रथ साहिब को एक ऐसे विशाल सागर मे जहाँ से फिर कोई मानवता इनको बाहर ना ला सके किस धर्म मे लिखा हैं की धमाके करो मरो और मारो और अगर लिखा हैं तो चलो करो विसर्जित अपने उस धर्म को अपनी आस्था कोअपने मन मे रखो और जीओ और जीने दो मानवता अब शर्मसार हो रही हैं तुम्हारी धर्म की परिभाषा से
क्या करूँ अब कैसे लिखू
बहुत दिन से
दिल कि कलम
से कुछ नहीं लिखा
क्यूँ
सूख गयी हैं मन कि स्याही
लोगो के काले मन देख कर
काली स्याही से काले शब्द
नहीं लिख पाती
और लहू के रंग के लाल शब्दों से
अपना ही मन डरता हैं
मीमांसा समीक्षा विवाद अपवाद
बुराइयों की मीमांसा करते करते
अच्छाइयों की समीक्षा करना
हम कबका भूल चुके
समय रहते चेत जाते
तो याद रहता की
विवादो की होती हैं मीमांसा
और
अपवादों की होती हैं समीक्षा
विवाद से अपवाद का सफर
बहुत था आसन बस
हम ही रास्ता भटक गए
अपने पराये
परायों कि भीड़ में
अपनों को ढूंढना
बहुत ही आसन है
बस ज़रा पीछे
मुड कर देख लो
जो तुम्हारे साये पर
पाँव रख
नहीं चल रहा है
वही तुम्हारा अपना हैं
वही चल रहा है
तुम्हारे साथ साथ ।
गांधारी की पीड़ा
क्यूँ नहीं कोई समझा मेरी पीड़ा
जब मैने आँख पर पट्टी बाँध कर
किया था विवाह एक अंधे से ।
पति प्रेम कह कर मेरे विद्रोह को
समाज ने इतिहास मे दर्ज किया ।
और सच कहूँ आज भी इस बात का
मुझे मलाल हैं कि ,
मेरी आँखों की पट्टी का इतिहास गवाह हैं
पर
ये सब भूल गए कि मैने
विद्रोह का पहला बिगुल बजाया था
बेमेल विवाह के विरोध मे ।
मेरी थी वो पहली आवाज
जिसको दबाया गया
और इतिहास मे , मुझे जो मे नहीं थी
वो दिखाया गया ।
ख़ुद से ही कह लेते हैं
ख़ुद से ही कह लेते हैं
अब वह सब जो कभी तुझ से कहते थे
रख सकते थे हम भी अपना
दामन खुशियों से भरा
इतरा सकते थे हम भी प्यार पर तेरे
पर ना जाने क्यों लगा की जो खुशी
मेरा साथ तुझे ना दे पायेगा
वह खुशी मेरा अलगाव तुझे दे जायेगा
पता था तू मुझे ना छोड़ पायेगा
सो हाथ मैने ही अपना छुडा लिया
तेरे प्यारो मे से नाम अपना
ख़ुद ही मिटा दिया
इसीलिये अब
ख़ुद से ही कह लेते हैं
वह सब जो कभी तुझ से कहते थे
वैदेही ने जो किया वह तुम ना करना
वैदेही ने जो किया
वह तुम ना करना
कोई भी अगर लाछन
तुम्हारे चरित्र पर लगाए
तो अब अग्नि परीक्षा
तुम ना देना
पति घर निकला भी दे
तब भी घर
तुम ना छोड़ना
ताकि फिर कोई लव कुश
घर से बाहर ना पैदा हो
और फिर कोई वैदेही
धरती मे ना समाये
और हाँ फिर किसी राम
को यज्ञ किसी सीता की
मूर्ति के साथ ना करना पडे
रामायण एक और रची जाये
या ना रची जाए
राजा अपना धरम निभाए
या ना निभाए
तुम अपना धर्म निभाना
आने वाली सीताओं के लिये
मार्ग प्रशस्त करती जाना
एक और औरतो की पीढी
नही उबर पाती हैं
जो अधिकार हक़ से उसके हैं
उनको पाने के लिये छल करती हैं
सदियों से छल ही तो करती आयी हैं
पर ये भूल जाती हैं कि हर छल मे
छली वही जाती हैं
सोचती हैं पति के अहम् को बढ़ावा दे दूँ
उससे डर कर रहने का नाटक कर लूँ
क्या मेरा जायेगा , जीवन मेरा तो
सुख सुविधा से कट जायेगा
कभी क्यो जीवन जीने का नहीं सोचती
त्रिया चरित्र का लाछन ले कर
क्या कभी जीवन जीने का सुख
वो पाएगी या एक और
औरतो की पीढी
बिना अधिकार अपने भोगे
दुनिया से जीवन काट कर चली जायेगी
मेरे पूरक ??
जुआ जब जब तुमने था खेला
वनवास काँटा मैने
धोबी को जब वचन तुमने दिया
घर दोनों ने बसाया
मालिक तुम कहलाये
लम्बी आयु तुमने पायी
नौ महीने कोख मे मैने रखा
वंश बढ़ा तुम्हारा
भोगा और सहा सिर्फ़ मैने
फिर किस अधिकार से
मेरे पूरक तुम कहलाये ??
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अगर राहे नई नहीं बनेगी
हम सब चले एक बंधी बंधाई लीक पर
इसलिये हम सब चाहते हैं
कि सब चले बंधी बंधी लीक पर
जो नहीं चलते हैं उनको देख कर
लगता तो हमे यही हैं
क्यो हम भी नहीं चले
पर फिर भी
टीका टिपण्णी हम जरुर करते हैं
लीक पर ना चलने वालो पर
ताकि अपने मन के शोभ को
कुछ कम कर सके
अपनी कमियों पर परदा डाल सके
पर मन मे हमे पता हैं
वह ग़लत नहीं हैं
जो राहे नई बनाते हैं
क्योकि अगर राहे नई नहीं बनेगी
तो सारी दुनिया को चलते ही रहना होगा
उन सडको पर जो टूट चुकी है
झूठ नहीं बोलूँगी
कमजोर नहीं थी ,
ना कर सकी दफ़न
अपने आप को
पर दफ़न कर दिया
हर उस सचाई को
जो करती उजागर
हमारे तुम्हारे
रिश्तों कि गहराई को
कमजोर नहीं थी ,
ना मार सकी
अपने आप को
पर मार दिया
अपनी हर उस इच्छा को जो
तुमसे शुरू हो कर
तुम पर ही खत्म होती थी
पर
बहुत कमजोर ही थी
क्योकि
रिश्ता बनाया मैने तुमसे
एक कमजोर इंसान से
जो रिश्ता बनाना तो जानता था
पर जिसे रिश्ता निभाना ना आया
प्रीत ---- वि- प्रीत
भाग १
सालो बाद
घर से बाहर रहा
पति लौट आया
घर मे तांता लग गया
बधाईयों का , मिठाईयों का
आशीष वचनों का , प्रवचनों का
गैस पर चाय बनाती
पत्नी सोच रही हैं
क्या वो सच मे भाग्यवान हैं ?
कि इतना घूम कर पति
वापस तो घर ही आया .
पर पत्नी खुश हैं कि
अब कम से कम घर से बाहर
तो मै जा पाउंगी
समाज मै मुहँ तो दिखा पाउंगी
कुलक्षिणी के नाम से तो नहीं
अब जानी जाऊँगी
भाग २
सालो बाद
घर से बाहर रही
पत्नी लौट आयी
घर मे एक सन्नाटा हेँ
व्याप्त हैं मौन
जैसे कोई मर गया हो और
मातम उसका हो रहा हैं
दो चार आवाजे जो गूंज रही हैं
वह पूछ रही हैं
कुलक्षिणी क्यो वापस आयी ??
जहाँ थी वहीं क्यो नहीं बिला गयी
सिगरेट के कश लेता
सोच रहा हैं पति
समाज मे क्या मुहँ
अब मै दिखाउँगा
कैसे घर से बाहर
आइना
आइना साफ करने से
चेहरे कि विकृति
अगर आकृति बन जाती
तो आज सबके चेहरे
सुंदर और सलोने ही होते
और
सुंदर चेहरों के पीछे
छुपे विकृत दिमाग
काश कोई आइना दिखा पाता
इस विकृत होते समाज मे
जीना ही कुछ आसान हो जाता
काश
साहित्यकार बनने कि होड़ मे
अपने को सही बताने कि होड़ मे
सब भूल गए संवेदनशील होना
भूल गए कि एक बच्ची "अरुशी"
मरी नहीं मारी गयी हैं
भूल गये कि उसके लिये
कोई उसका अपना
शायद ही आंसूं बहा रहा हो
अच्छे साहित्यकार ना साही सही
एक अच्छे इंसान ही बन जाते
दो आंसू उस "अरुशी" के लिये बहा लेते
दो बूंद स्याही की उसके लिये भी खर्च देते
दो शब्द उसकी आत्मा कि शांती के लिये
लिख देते ।
प्रगाढ़ संबंधो की पीड़ा
कभी सुख कभी दुःख
कभी आंसू कभी हसीं
वह लेते रहे
वह देती रही
सम्बन्ध प्रगाढ़ रहे
साथ पर ना वह रहे
प्रगाढ़ संबंधो मे
ना बाँट सकने कि
पीड़ा को
वह महसूसती रही
वह खामोश देखते रहे
घुटन
उसे जिसे
बंद खिड़की होने के
एहसास से ही
घुटन होती थी
उसके लिये दरवाजे सब
मैने बंद कर दिये
कह दिया जाओ
जियो अपनी जिंदगी क्योकि
हर बार जब भी
दरवाजा तुम बंद करते थे
मै खिड़की खुली रखती थी
ये सोच कर कि
तुम को घुटन ना हो
पर अब मै थक गयी हूँ
तुम्हारे बंद किये
खिड़की दरवाजो को खोलते
सो अब निर्णय मेरा है
दरवाजा बंद रखने का
आज़ादी
देखा मैने कुछ लोगो को
पूछा मैने उनसे
क्या करोगे ??
अगर आजादी मिल गयी तुमको
जवाब मिला गरीबो मे बाँट देगे
वह बेचारे भी इसे ओढ़ बिछा लेगे
नमी तुम्हारी आंखो की
मन मे था प्यार होठो पर हँसी
खाली हाथ तुम गये दूर मुझ से
मन मे था पश्चाताप आंखो मे नमी
भूल गए हो तुम
आ कर ले जाओ
हँसी खुशी से रहो
और नमी तुम्हारी आंखो की
मेरी आंखो मे रहे
काश
हर बात का एक दूसरा रुख भी होता है
काश तुम देख सकते
हर रुख मे एक नया आयाम होता है
काश तुम समझ सकते
हर आयाम मे एक नया मोड़ आता हैं
काश तुम साथ चले तों होते
हर काश मे एक आह होती है
काश तुम महसूस कर सकते
एक घुटन भरी डायरी - असफल औरत
एक घुटन भरी डायरी
यानि एक असफल औरत
एक सफल पुत्री
एक सफल पत्नी
एक सफल माँ
और एक असफल इंसान
मानसिक रूप से टूटी
सामाजिक रूप से सुरक्षित
गलती हमेशा अपनी नहीं
किसी और की खोजती
सब सुविधा से घिरी
फिर भी असंतुष्ट
सदियों से केवल साहित्य रचती
एक घुटन भरी डायरी लिखती
एक असफल औरत जो
इनसान ना बन सकी
राह अपनी ना चल सकी
क्योकी चाहती थी
राह के कंकर कोई चुन देता
सिर पर छाँव कोई कर देता
और सफल इंसान वो कहलाती
घुटन से आजादी वो पाती
ज्वलंत प्रश्न हैं अनुतरित
एक सेट मोल्ड { सांचे } मे नारी
यानी मोम की गुडिया
युगों से दब दब कर
दूसरो के मनचाहे आकार मे जो
ढलती रही , पसंद आती रही
एक सिरे पर ही नहीं
दोनों सिरों पर जलती रही
आज उसी मोल्ड { सांचे } को तोड़ कर
जो मोम बह रहा हैं
लावा सबको लग रहा हैं
क्योकी जलने के साथ साथ
वह लावा जला भी रहा है
जहाँ जहाँ से बह रहा है
तोड़ कर अपनी सीमाये
कौन हैं जिमेदार है इस
लावे के बहाने का
कौन करेगा ठंडा इस मोम को
जो लावा बन चुका है
क्या नारी ?
बनकर दुबारा सहनशीलता की प्रतिमा
क्या पुरूष ?
बनकर सहनशील , उदारशील
क्या समाज ?
बदल कर मान्यताये अपनी
ज्वलंत प्रश्न हैं अनुतरित
अनचाहे सपने
नहीं है मेरे हाथो मे
कि रोक सकूं मै
तुम्हारा आना
सपनो मे ।
पर आंखे तों मै अपनी
खोल ही सकती हूँ
नींद से जग तों सकती हूँ
अनचाहे सपनो से
बच तों सकती हूँ ।
अपने कल के सपनो से
अपने आज को बचा कर
अपने कल को सुरक्षित
कर तों सकती हूँ ।
बोली यादे
दिल के बंद दरवाजो पर
दस्तक देती यादो से पूछा मैने ,
क्यों बारबार बंद दरवाजो को खटखटाती हो ?
क्यों बिन बुलाये हर तीज त्यौहार चली आती हो ?
एक याद बोली ,
मै आती कहा हैं , तुम बुलाती हो
दूसरी याद बोली ,
आती हूँ इसलिये ताकि तुम अकेली ना महसूस करो
फिर तीसरी याद ने कहा ,
मै आती नहीं भेजी जाती हूँ
वो ही मुझे बार बार तुम तक भेजते हैं ,
जो ख़ुद आ नहीं पाते हैं
यादो की दस्तक जारी हैं ,
दिल के बंद दरवाजो पर
बदले हुए युग की सीता और अहिल्या
क्यों बनू अहिल्या मै
शापित जीवन क्यों मै काँटू
बन कर इक शिला
जीवन अगर मेरा शापित है
तो भी क्यों न उसे जीउँ मै
क्यों इंतज़ार करू मै
किसी राम के आगमन का
नहीं मै अहिल्या नहीं बनूगी
युग अब बदल गया है
मर्यादा पुरुषोतम
राम नाम
कही खो गया है
जो पत्थर मे ड़ाल सकें प्राण
और शाप ना देना मुझको
ना लेना अब कोई परीक्षा
क्योकि युग बदल गया हैं
अब ऐसी ग़लती न करना
बदले हुए युग की सीता
और अहिल्या ने अब
लक्ष्मण रेखा अपने
चारो और खीच ली हैं
जहाँ आकर तुम्हारे
शाप की परिधि समाप्त हो जाती है
और तुम्हारे भस्म होने की
सीमा शुरू हो जाती हैं
हाँ , तुम नारी हो
क्यो तुम लड़ती रहीं
क्यो तुम जूझती रहीं
क्यो तुम चाहती हो
बदलना मानसिकता औरो की
क्या फरक हैं फिर तुममे और उनमे
मत जुझो , मत लडो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता
जियो उस स्वतंत्रता को जो
इश्वरिये देन , जो नहीं कोई और तुमेह देगा
नारी हो नारी ही बन कर रहो
प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लडो , मत जुझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ
अधूरी तुम नहीं हो , क्योंकी तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो
तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की ,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है
होली
याद हैं होली जो बीती थी उस साल
जब हम साथ साथ ना होते हुए भी
साथ साथ थे ,
तरंगों से जुडे थे मन हमारे
कितने ही संदेशे आये गये
ना जाने कितने रंग बिखरे
रीता मन भीगा दोनों का
फिर आ रही हैं होली
पर रीति ही जायेगी
रंग अब ना बिखेर पायेगी
वाह !! कितनी ज्वलंत हैं आज , "कल" की "भोली" नारी
लजाती सकुचाती
सिमिटी सकुचाई
शांत , मौन
तब कुछ ना बोली
जब दान हो कर
पिता से दहेज़ लेकर
चली पीया के संग
नारी धन कमाती
स्वाबलंबी , नौकरी करती
पति के संग आती जाती
सुरक्षित महसूसती
तब कुछ ना बोली
नारी ममता को अनुभाती
सामाजिक गरिमा पाती
तब कुछ ना बोली
और जब सब पा लिया
तो आवाहन किया
समय हैं
अब आत्म मंथन का
समाज मे फैली कुरीति
कन्यादान क्यों ? पर सोचने का
समाज मे पत्नी पर हो रहे
अत्याचार के खिलाफ
आवाज उठाने का
अपने अधिकारों के प्रति
सचेत होने का
आवाहन करती , शोध करती
भाषण देती
वाह !! कितनी
ज्वलंत हैं आज ,
"कल" की " भोली" नारी
क्योकी अब समय हैं
औरो को समझाने का ,
नियमावली दूसरो के लिये
नई बनाने का
अपनी कूटनीती को
आवरण विवशता
का पहनाने का
यादो के गुलदस्ते
गुलाब के फूल की तरह
सुगन्धित है यादें आपकी
आज फिर आपकी यादो के गुलदस्ते से
एक याद को गुलाब समझ कर निकाला
और आप को ही समर्पित कर दिया
आप की चीज़ फिर आप तक पहुँची
और मै जहाँ थी वहीं रही
सहेजती यादो को , आपके वादों को
हमेशा ताजी रहें ये यादे मेरे मन मे
और समय समय पर मै
इन यादो के गुलदस्ते से
एक याद को फिर निकाल कर
आप को दे सकूं
और
जी सकूं अपने सच के साथ
भावना हैं प्यार बहता है निरंतर
प्यार को बाँधना नही
प्यार मे बंधना सीखो
जिसने भी कोशिश कि है
प्यार को बांधने की
प्यार उससे दूर ही रहा है
पर जो बंधा है प्यार मे
प्यार ने उसको सरोबर किया है
प्यार नहीं है कोई वस्तु
प्यार नहीं है कोई जीव
कि हम तुम उसे बाँध सके
भावना हैं प्यार बहता है निरंतर
जिस को भी सरोबर करता है
वो ही इसको समझ सकता है
बाक़ी तो सब रिश्तो मे बंधते है
प्यार मे जो बंधता है
वो भावना और विश्वास मे
बंधता है
गंधाती सड़क
एक गंधाती सड़क से पूछा
दूसरी गंधाती सड़क ने
क्या बात हैं हम क्यों इतना गंधाती हैं
ये गंध ना डीजल की है , ना पट्रोल की
फिर कहाँ से आती हैं
जवाब दिया दूसरी सड़क ने
अरी बावरी अभी यहाँ से
एक जो गया हैं
अपना परिचय वह
यहाँ सार्वजनिक कर गया है
इस गंध को सालो से हर
सड़क झेल रही है
पता नहीं और कब तक झेलेगी
सबके घरो मे हैं
एक सुलभ शौचालय
फिर भी सडको पर
इनका आना जाना
लगा ही रहता
और सड़के गंधाती रहती है
सड़क = वेश्या
सौ बातो की एक बात हैं
तुम आये या मैने बुलाया
एक ही तो बात थी
प्याला स्नेह का
तुमने पीया मैने पिलाया
एक ही तो बात थी
तुम क्यो आये
ना मैने पूछा ना तुम ने बताया
एक ही तो बात थी
तुम चले गए
ना मैने रोका ना तुम ने पीछे देखा
एक ही तो बात थी
मैने तुमहें छोडा या तुमने मुझे छोडा
एक ही तो बात है
दिल मेरा टूटा या तुम्हारा टूटा
एक ही तो बात है
प्याला स्नेह का दोनो से छुटा
एक ही तो बात है
ना तुम्हारी जुबां पर नाम है मेरा
ना मेरी जुबां पर नाम है तुम्हारा
एक ही तो बात है
सोच मे मेरी आज भी तुम हो
सोच मे तुम्हारी आज भी मै हूँ
सौ बातो की एक बात हैं
बेटर हाफ
नैतिकता बोली अनैतिकता से
तुम क्यो भिन्नाती हो
मेरे पति को सही गलत समझाती हो
मै बहुत हूँ उनके लिये
बाहर तो मै उनको बचाती हूँ
बंद कमरे के अन्दर
जूते खूब लगाती हूँ
इसीलिये तो उनकी बेटर हाफ
मै कहलाती हूँ
एक संवाद
अनैतिकता बोली नैतिकता से
क्यो इतना इतराती हो
मेरे प्रेमी के साथ रहती हो
और पति है वह तुम्हारा
बार बार मुझे ही समझाती हो
कभी मेरी तरह अकेले रह कर देखो
अपने सब काम खुद करके देखो
पुरुष को प्यार सिर्फ और सिर्फ
उसके प्यार के लिए कर के देखो
सामाजिक सुरक्षा कवच
पुरुष को तुम बनाती है
समाज मे अनैतिकता तो
तुम भी फेलाती हो
फिर बार बार
नैतिकता का पाठ
मुझे ही क्यो पढाती हो ??
तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै
पार्वती भी मै
दुर्गा भी मै
सीता भी मै
मंदोदरी भी मै
रुकमनी भी मै
मीरा भी मै
राधा भी मै
गंगा भी मै
सरस्वती भी मै
लक्ष्मी भी मै
माँ भी मै
पत्नी भी मै
बहिन भी मै
बेटी भी मै
घर मे भी मै
मंदिर मे भी मै
बाजार मे भी मै
"तीन तत्वों " मे भी मै
पुजती भी मै
बिकती भी मै
अब और क्या
परिचय दू
अपने अस्तित्व का
क्या करुगी तुम से
करके बराबरी मै
जब तुम्हारे
अस्तित्व की
जननी हूँ मै
तुम जब मेरे बराबर
हो जाना तब ही
मुझ तक आना
पार्वती माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमनी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा , पवित्रता का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
बाजार , वासना का प्रतीक
तीन तत्व , अग्नि , धरती , वायु
गणतंत्र दिवस की सभी को बधाई
तिरंगा
ए मेरे तिरंगे
जब तू लहराता हैं
ओठो पे मुस्कान लाता है
जब तू झुक जाता है
आंखे नम कर जाता है
ना जाने कितनी
भाषाओ , धर्मो , जातियो को
तू देता है एक छाँव
और देता है
एक शान बहुतो को
बन के कफ़न उनका
एहसास ही तेरा
काफी होता है
वंदे मातरम्
महसूस करने के लिये
गणतंत्र दिवस की सभी को बधाई , हमारे देश मे प्रेम और सौहार्द हमेशा फलता फूलता रहें
आज तिरंगा हरभजन ने पर्थ मे फेहराया है
जीत का जश्न फिर इंडिया ने मनाया है
जीती नहीं इंडिया क्रिकेट मे
जीती है इंडिया संस्कारों मे
क्या मिला होगा उनको सुख १६ जीतो से
जो सुख हमने इस एक जीत से पाया है
आज तिरंगा हरभजन ने पर्थ मे फेहराया है
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कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??
देश को आजाद हुए , होगये है वर्ष साठ
पर आज भी जब बात होती है बराबरी कि
तो मुझे आगे कर के कहा जाता है
लो ये पुरूस्कार तुम्हारा है
क्योंकी तुम नारी हो ,
महिला हो , प्रोत्साहन कि अधिकारी हो
देने वाले हम है , आगे तुम्हे बढाने वाले भी हम है
मजमा जब जुडेगा , फक्र से हम कह सकेगे
ये पुरूस्कार तो हमारा था
तुम नारी थी , अबला थी , इसलिये तुम दिया गया
फिर कुछ समय बाद , हमारी भाषा बदल जायेगी
हम ना सही , कोई हम जैसा ही कहेगा
नारियों को पुरूस्कार मिलता नहीं दिया जाता है
दिमाग मे बस एक ही प्रश्न आता
और
कब तक मेरे किये हुए कामो को मेरी उपलब्धि नहीं माना जाएगा ??
और
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
क्योंकी मै स्त्री हूँ , माँ हूँ , बहिन हूँ , पत्नी हूँ
उनसे तो मै फिर भी लाख दर्जे अच्छी हूँ
जिनका कोई मान समान ही नहीं हैं
जब भी
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
जिन्दगी की लड़ाई मै , आगे ही बढ़ी हूँ
औरो से उपर ही उठी हूँ
नहीं तोड़ सके हैं वह मेरा मनोबल
जो करते है सम्मानित , अपमानित मुझे
क्योंकी मैने ही जनम उनको दिया है
दे कर अपना खून जीवन उनको दिया है
दे कर अपना दूध बड़ा उनको किया है
नंगा करके मुझे जो खुश होते है
भूल जाते है उनके नंगेपन को
हमेशा मैने ही ढका है
२००८ से उम्मीद है
२००८ से उम्मीद है बस इतनी
निरस्त्र करे वो हर अस्त्र को
लाये विश्व मे अमन
शांती और स्नेह
फिर कोई इंदिरा ना बने राजीव
फिर कोई बेनजीर ना बने बिलावल
माँ से पाए हर पुत्र
केवल विरासत प्यार की
झरना बावडी
झरना बह रहा था
बावडी प्यासी थी
सोचा उसने
झरने को अपने मे समा लू
अपनी प्यास बुझा लू
झरने ने अपनी रहा बदली
बावडी को भर दिया
तब बावडी ने जाना
प्यासी वोही नही थी
झरना तो उससे भी ज्यादा
प्यासा था , कही समाना चाहता था
इसीलिये वह खुद बावडी तक आया
उसको भरा और फिर उसको अपने मे
समेट आगे चला
बावडी फिर कही नहीं थी
झरना भी विलुप्त हो गया था
बस बह रही थी
एक नदी प्यार की
सच की टीस झूठ का दर्द
सच मे टीस होती है
झूठ मे दर्द होता है
फिर भी लोग
झूठ बोलते है
खुद को टीस और
दूसरो को दर्द देते है
काई
रिश्तों के ऊपर
जब काई आजाती है
रिश्ते सड़ जाते है
लोग फिर झूठ बोल कर
खुद को बचाते है
और भ्रम मे रहते है
की उन्होने रिश्तों को
बचा लिया
रिश्ता तो कबका
दम तोड़ चूका होता है
काई के नीचे
झूठ और अविश्वाश कि गंध से
काई से अच्छे से अच्छा भी
हो जाता है बुरा
ये कविता अपने ओरिजनल फॉर्म मे इंग्लिश मे है और काफी लंबी हैं ।
बस यूं ही , बस ऐसे ही
तुम्हारे गुनाह की सजा
की मुकर्र हमने
करके माफ़ तुमको
तुम बस यूं ही गुनाह
करते रहो
हम बस ऐसे ही माफ़
करते रहेगे
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ -- भाग 2
पढ़ लिख कर नौकरी की
आज्ञाकारी पुत्री बन कर विवाह किया
आज्ञाकारी पुत्रवधू बन कर वंशज दिया
और अब सहिष्णु पत्नी बनकर
पति की गलतीयों पर पर्दा डालती हूँ
मै खुद क्या हूँ , मेरा अस्तित्व क्या है
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ
______________________
एका एक आईना दिखा मुझे
और आज्ञाकारी पुत्री का चोला पहने
दिखी एक लड़की जिसने अपनी शादी मे
लाखो खर्च करवाये अपने पिता के
जिसने पाया एक पति ,पिता के कमाए हुये धन से
और आज्ञाकारी पुत्रवधू का चोला पहने दिखी एक औरत ,
जिसने ससुर के पैसे से मकान अपना ख़रीदा ,
अपने मकान को, घर पति के
माता पिता का ना बनने दिया
और सहिष्णु पत्नी का चोला पहने दिखी
एक विवाहिता , जिसने अपने पति को
हमेशा ही एक सामाजिक सुरक्षा कवच समझा
___________________________________
इससे पहले कि आइना और कुछ दिखता
मेरी महानता का आवरण और उतरता
कोई देख पता कि मै भी केवल एक साधारण स्त्री हूँ
जो केवल अपने स्वार्थ के लिये जीती है
मैने आइने पर फिर एक पर्दा डाला
___________________________________
दो चुटकी सिंदूर माँग मे भरा
ससुर के पैर छुये
पिता को कुशलता का समाचार दिया
और पति के साथ उसकी लंबी कार मे
बेठ कर दूसरा या तीसरा हनीमून मनाने
मै चल पडी ।
पति के पर - स्त्री गमन को
वासना कह कर , पुनेह उससे संबंध बनाने के
निकृष्टतम समझोते को करने
ताकि ऐशोआराम से बाक़ी जिन्दगी
अपनी महानता का गुणगान करते
सुनते बीते
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ
पढ़ लिख कर नौकरी की
आज्ञाकारी पुत्री बन कर विवाह किया
आज्ञाकारी पुत्रवधू बन कर वंशज दिया
और अब सहिष्णु पत्नी बनकर
पति की गलतीयों पर पर्दा डालती हूँ
मै खुद क्या हूँ , मेरा अस्तित्व क्या है
आज भी मै अपने को ढ़ूढ़ती हूँ
समय बहुत है अभी
जिन्दगी की सड़क थी
अनुभवो के मील पत्थर थे
मन की स्याही थी
दिमाग की कलम थी
शब्दों का कारवाँ बनता गया
किसी ने कहा ये कविता है
और मैने मान लिया
आप ने जो मान दिया
शब्दों को कविता मान कर
क़र्ज़ है मुझ पर
जिसको और भी सुंदर लिख कर
उतारुगी धीरे धीरे
समय बहुत है अभी
जिन्दगी की सड़क पर
मील पत्थर नये खोजने के लिये
गंगा नहा कर मै आयी हूँ
बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ
जब भी कहीं कुछ मरता है
गंगा नहाना बहुत जरुरी होता है
अस्थिया भी विसर्जित गंगा मे ही होती है
पाप भी गंगा मे ही धुलते है
पाप ही नहीं पुण्य करके भी गंगा नहाते है
भटके हुओं को घर पंहुचा कर भी गंगा नहाते है
कायर रिश्तों की लाश को कब तक मै ढोती
दूसरो के पापो को कब तक मै सहजती
कर दिया है मैने विसर्जन
अनकहे के इंतज़ार का
बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ
सच
कुछ चीज़ें महसूस की जाती है
सच भी एक ऐसा ही जज्बा है
जिसे , जिसने महसूस किया , जज्ब किया
वह ही इसे समझा , उसी ने इसे जाना
बिना श्लोको की पूजा है सच
बिना आयतों की इबादत है सच
सचाइयां कितनी है कड़वी इस जिन्दगी की
कि लोग देखना और सुनना ही नहीं चाहते है
पर क्या आँख बंद करने से सचाई बदल जायेगी
और कान बंद करने से सच सुनाई नहीं देगा
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।
नहीं सौपा मैने अपना शरीर उसे
इसलिये
कि उसने मेरे साथ सात फेरे लिये
कि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दी
कि उसने मेरे साथ घर बसाया
कि उसने मुझे माँ बनाया
सौपा मैने अपना शरीर उसे
इस लिये
क्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थी
मेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार की
और उसके बदले नहीं माँगा मैने
उससे कुछ भी , ना रुपया , ना पैसे
ना घर , ना बच्चे , ना सामाजिक सुरक्षा
फिर भी मुझे कहा गया की मै दूसरी औरत हूँ !!
घर तोड़ती हूँ ।
प्रश्न है मेरा पहली औरतो से , क्या कभी तुम्हें
अपनी कोई कमी दिखती है ??
क्यो घर से तुम्हारे पति को कहीं और जाना पड़ता है ?
क्यो हमेशा तुम इसे पुरुष की कमजोरी कहती हो ?
क्यो कभी तुम्हें अपनी कोई कमजोरी नहीं दिखती ?
जिस शरीर को सौपने के लिये ,
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।
जिन्दगी
मै चाहता था की मै प्रेम विवाह करू
पर मैने प्रेम किया एक विवाहिता से
जो मुझसे सात वर्ष बड़ी थी , और
दो बच्चो की माँ होने के बाद भी
नाखुश थी अपने विवाहित जीवन से
पर मेरे प्रेम को मुझे प्रेम करने के बाद भी
ना स्वीकार सकी और निभाती रहीं
शादी के समझोते को ।
मैने फिर अपने माता पिता की पसंद
से शादी की , मैने लड़की को नहीं देखा
उसने मुझे आकर मेरे घर देखा
शादी करनी थी मुझको क्योंकी
मै अकेला नहीं अपने को सम्भाल पा रहा था ।
शादी हुई , जिन्दगी कुछ आगे चली ,
कुछ नये संबंध बने , कुछ पुराने टूटे ।
शादी हुई पर प्रेम ना हो सका ,
नहीं मै अपने अतीत मे नहीं जाता था ,
वह दरवाजा तो मै तभी बंद कर आया था ।
दुनिया की नज़र मे ही नहीं अपने नज़र मे भी
मे खुश ही था ।
शादी की सौगात था मेरा बेटा ,
मेरी आंखो का तारा
दिल मेरा फिर भी प्रेम से खाली था ।
दूरिया बहुत थी हम पति पत्नी मे ।
न वो गलत थी , न मै गलत था ,
पर मन मेरा फिर भी भटक रहा था ।
भटके हुए मन को सहारा मिला
एक दोस्त के शब्दों मे।
बहुत संभाला उसने मुझको ,
हमेशा की तरह प्यार से दुलार से ।
जब कोई नहीं होता है मेरे पास ,
हमेशा होती है वह ,
होता है उसका प्यार , उसका दुलार ।
अकेली है वो , मुझसे सात साल बड़ी है वह ।
मैने अपने सपनो मे
जैसी जीवन साथी की कल्पना की थी
बिल्कुल वैसी ही है वह .
पर मैने क्यो कभी नहीं चाहा उसे
जबकी वह हमेशा से मेरे आस पास थी ।
फिर आज क्यो ?? मैने कहा उससे की शायद
मै उसे प्यार करता हूँ ।
क्यो कहा मैने ??
जबकी मुझे पता था की मै कायर हूँ
और नहीं छोड़ पाऊंगा अपना विवाहित जीवन ।
जितना प्यार मैने उससे पाया ,
कहीं नहीं मिला मुझको
फिर भी मै उस को कुछ ना दे सका ,
हमेशा उस मोड़ पर छोडा उसको
जब मुझे उसके साथ होना था ।
आज मै उसको वोही दर्द दे आया
जो कभी मुझे मिला था ।
मेरा दर्द तो तब भी उसी ने बांटा था
पर आज वह अकेली लड़ रही है ,
उस दर्द से जो मैने उसे दिया है ।
आज मै भी अपने प्रेम को ना निभा कर
निभा रहा हूँ शादी का समझोता ।
जिन्दगी की दौड़ मे
मै सफलता की सिढ़ियॉ चढ़ रहा हूँ
पर अपनी नज़र मे
मै बहुत नीचे गिर गया हूँ ।
सफ़ाई
उसकी सफाई क्यो दूँ
मै किसी को ,
एक पाक साफ रिश्ते को
दे कर सफ़ाई नहीं
किया कभी गन्दा मैने ।
जिस को जो समझना है
उसने वह समझा
तुमने हमको और हमने तुमको
तो बस अपना समझा ।
जो तुम से बाँटा वह
गम भी नहीं था , ख़ुशी भी नहीं थी
बस एक पल था ,
जिसमे तुम्हारी हमारी जिन्दगी की
सचाई थी , जिसे जी कर हमने जाना
रिश्ता प्यार का रिश्ता विश्वास का
है हमारा , जिसको नहीं है जरुरत
किसी सफ़ाई की ।
इस दिवाली एक दिया जलाया है मैने
अपने घर मे तुमने
रोशनी से जगमगाया
होगा घर तुम्हारा
पर कितने दियो मे
था तेल विश्वास का
और बाती सच की ?
मैने तो एक ही दिया
जलाया है ,
सच की बाती , और
विश्वास के तेल से
और मेरे मन मे
है रौशनी १०० दियो की
इस दिवाली पर
क्योकी ३० सालो के पुराने दीप
पिछले साल ही सिरा दिये थे मैने
अब तो कुछ दीप नये होगे
कुछ होगी मोम बतियाँ
बीते हुए को सिरा के
नये को रोशन करुगी मै
दीपो की माला नहीं होगी
पर रौशनी की कमी
अपनी माँ के घर
नहीं होने दूगी मै
अंधेरे अब कुछ दूर जाते अब दिखते है मुझको
अपने साथ आशाये
फिर लाई हैं ,
काली लंबी रात के बाद
दीप दिवाली के फिर
झिलमिलाते दिखते है मुझको
अंधेरे अब कुछ दूर जाते
अब दिखते है मुझको
घर - सुविधा दुविधा
घर एक सुविधा
कभी भी आने की
कभी भी जाने की
घर एक दुविधा
निज को खोने की
घर एक सुविधा
तुम को पाने की
घर एक दुविधा
खुद को भूल जाने की
घर एक सुविधा
कभी भी आने की
कभी भी जाने की
नई सुबह
धरती घूम रही थी
सूरज ढ़ूड़ रहा था
कहाँ लाये वो
नई सुबह
मैने कहा
मेरे घर आजाओ
उसे ही अपना
पूरब और पश्चिम बनाओ
मेरे शब्द
सीधे सपाट शब्द हैं मेरे
हर टिप्पणी जो इन शब्दों
को मिलती है सिर्फ
इनकी सचाई को सहलाती है
और एक नया रिश्ता रोज
बनाते है शब्द मेरे
अधिकार
मैने तो ऐसा कोई अधिकार
कह कर तो
कभी तुम्हें दिया नहीं
की तुम जो कहोगे
मै मानूगी
फिर भी
जब भी तुमने
कुछ भी कहा मैने माना
क्योकी मै मानती हूँ
की तुम्हारा पूरा अधिकार है
मुझ पर
अधिकार की परिभाषा
रिश्तों की भाषा से
अलग होती है
कुछ रिश्ते अधिकार से बनते हैं
और कुछ रिश्तों मे अधिकार होता है
बिना नाम के रिश्तों मे
अधिकार नहीं प्यार होता है
और प्यार के बन्धन
बिना नाम के
एक दूसरे को
बंधते हैं ता उम्र
और इस बन्धन को
जो स्वीकारते है
वह दुनिया मे
अकेले नहीं होते है
पर अलग जरुर होते है
दुनिया की रीत
ये दुनिया की रीत है
गुनाह कोई करता है
सजा किसी को मिलती है
ये दुनिया की रीत हे
प्यार कोई करता हैं
वफ़ा किसी को मिलती है
तलाश है इस कविता के शीर्षक की
जब भी तुम से बात होती है
एक दिया कहीँ टिमटिमाता हैं
और फिर तुम्हारी लंबी खामोशी से
वो भी बुझ जाता है
अब की बार दिवाली पर
कितने भी दिये जलेगे
पर मन का अँधेरा नहीं मिटेगा
अभी तो ना जाने
कितनी और दिवालियाँ आयेगी
जो रोशनी सबके घरो मे लाएगी
पर मेरे मन के अंधेरो को जो
रोशन कर सके
वो दिवाली तुम कब लाओगे
शायद इस उम्र मे तो
अब तुम मिलने नहीं आओगे
नज़दीकियाँ -- दूरियाँ
आने वाली नज़दीकियाँ
महसूस करा रही हैं
की दूरियाँ भी अब दूर नहीं
मन डरता हैं उन नज़दीकियों से
जिनकी आड़ ले कर दूरियाँ
बार बार आती हैं
नज़दीकियों तो जब भी आती है
आगे के दरवाजे से आती है
बार बार मन का दरवाजा खटखटाती हैं
पर क्या करु इन दूरियों का
जो चोरी छुपे पीछे के दरवाजे से
दिमाग के रास्ते आती है
और फिर नज़दीकियों को
मन से दूर करती हैं
नज़दीकियों मे मन होता हे मेरा
दूरियों मे दिमाग होता है मेरा
नज़दीकियाँ -- दूरियाँ बन गयी हैं
मेरी रचना की मजबूरिया
प्रश्न और उत्तर
अनुत्रित प्रश्नों के पास आये थे उत्तर
कहने की हमे कुछ समय और दे दो
हमे बहुत कुछ कहना है प्रश्नों तुमसे
अनुत्रित प्रश्नों ने कहा जाओ उत्तरों
समय वो बीत गया जब हम रास्ता
तुम्हारा देखते थे , अब हमे किसी भी
उत्तर की चाह नहीं ,क्योकी कोई भी उत्तर
वापस नहीं ला सकता वो समय जो
प्रश्नों ने खोया उत्तरों की प्रतीक्षा मे
अनन्त काल तक कौन सा प्रश्न
रुका रहता है उत्तर की चाह मे
बेमानी हो जाते है वह उत्तर जो
समय से नहीं दिये जाते है
और केवल मन भारी करते हैं
उत्तरों और प्रश्नों का
शतरंज
आज की भागम भाग जिन्दगी मे
सब की बिसात बिछी है
किसी का घोडा ढाई घर चलता है
किसी का ऊंट तिरछी चाल से मारता है
किसी का हाथी सीधा ही भिड़ता है
सब को चिन्ता है अपने अपने वजीर की
और सब बचाना चाहते है अपने राजा को
शह और मात के खेल मे
कब बाजी पलट जाये क्या पता
६४ खानों मे ६४ कलाये सबको दिखानी हैं
अपने को सफ़ेद और दूसरो को काला
बता कर बाज़ी जीतनी हैं
" लाइफटाइम् "
समय
तुम सबको सीखाते हो
की जिन्दगी मे
आगे बढने के लिये
चलना बहुत जरुरी है
जिन्दगी
तुम सबको सीखाती हो
की समय के साथ चलो
और शायद इसीलिये
" लाइफटाइम् "
मे दुनिया समाई है
यादे
अनामिका मे एक अंगूठी हो
तुम्हारी , तुम्हारी दी हुई
बस इतना ही माँगा था
फ्रेम मे एक तसवीर हो
तुम्हारी, तुम्हारी दीं हुई ,
बस इतना ही माँगा था
और ये भी सिर्फ
तुमसे ही माँगा था
नही दिया तुमने
अगर नहीं देंना था
तो मत देते ये यादे भी .
अनामिका मे एक अंगूठी
दे सकता था , पर
अंगूठी उतारी जा सकती है
फ्रेम मे एक तसवीर
दे सकता था , पर
तसवीर फाड़ी जा सकती है
इसीलिये यादे दीं है
जो समय के साथ
बदलेगी नहीं
यादो मे रहूँगा मै हमेशा तुम्हारी
कितना भी चाहो भूल नहीं सकोगी मुझे
मेरे शब्दो मे
आदत सी हो गयी
थी उन्हे ,
अपने को देखने की
मेरे शब्दो मे ,
मेरे शब्द बन गए थे
उनकी पहचान ।
जब भी उन्हे डर होता था
अपने खोने का
मेरे शब्दो मे आपने को पा लेते थे
एहसास हो जाता था उन्हे की वह
अभी जिंदा है ।
आज मेरे शब्दो मे
कुछ उन्हें नहीं दिखता
क्योकि अब मेरे शब्दो मे
वह नहीं है और मेरे दिल
मे वह देख नहीं सकते
" ना "
मिलना बिछड़ना
खोना पाना
लेना देना
आना जाना
हंसना रोना
इन मे है
समानता
बस एक
सब मे है
एक " ना "
ना कुछ अपना था
ना कुछ अपना होगा
ना कुछ लाये थे
ना कुछ ले जायेगे
फिर क्यो उलझाते है
हम अपने को बार बार
इस "ना" मे
क्या डरते है देखने से अपना अक्स हम आइने मे
आइने के पीछे खड़े हो कर
दिखाते है आइना हम सबको
क्या डरते है देखने से
अपना अक्स हम आइने मे
जो साथ ना खड़े हो कर
एक दूसरे के हम
केवल पीछे रहना चाहते है
कमियाँ अपनी नहीं
दूसरो की देखना चाहते है
हम भी जीते जाते है वो भी जीते जाते है
हम जिनके ख्यालों मे आते है
नज़रों मे उनकी कोई और होते है
जिनकी यादो मे घर है मेरा
घर वो किसी और का बसाते है
जो छुप छुप के हाल हमारा पता करते हैं
वो दुनिया की रस्मे निभाते है
उनका नाम नहीं हम जुबा पे लाते है
वादों की कसमे हम निभाते है
हम भी जीते जाते है वो भी जीते जाते है
हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालय
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है
हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
बस ऐसे ही
जो कभी बसे ही नहीं
उजड़ने का क्यूँ कर डर उनको होगा
जो कभी जीये ही नहीं
मरने का क्यूँ कर डर उनको होगा
खो रहे है रिश्ते
एक समय था
जब माँ के घर से जो आता था
मौसी मामा नानी नाना
कहलाता था
पूरा पडोस मायेका होता था
पिता के दोस्त चाचा ताऊ होते थे
जिनके कंधे पर चढ़ता था बचपन
आस पड़ोस मे लडकिया नहीं
बुआ , मौसी , मामी , चाची रहती थी
जिनकी गोदीयों मे सुरक्षित
रहता था बचपन
हमे तो मिले है संस्कार बहुत
क्या हम दे रहे है अगली पीढ़ी को
एक डर एक सहमा हुआ बचपन
क्यो खो रहे है रिश्ते
ज़िन्दगी की भीढ़ मे
दो पल
एक प्यार एक समर्पण
एक लेना एक देना
एक रास्ता एक मंजिल
एक मिलना एक पाना
एक जाना एक बिछड़ना
एक मौत एक जिन्दगी
आज के ताज़ा समाचार, नपुंसको की बस्ती से
नपुंसको की बस्ती है
अस्मत लूटती है पुत्री की
पिता लूटता है
मासूम बच्चे बनते है निवाला
नरभक्षियो का
छात्राओं के अश्लील चित्र
अध्यापिका खीचती है
मेहमानों के कमरों मे
मेजबान कैमरे लगाता है
दलितों को आज भी दण्ड
पुजारी देते है
दस माह के दुध्मुहे को
पंच माँ से अलग करते है
आज के लिये इतना ही
और सुनने की ताकत नहीं
क्या नाम दे उन रिश्तों को
क्या नाम दे उन रिश्तों को
जो बिखरी हुई जिन्दगी मे
मिलते हैं शब्दो की तरह
चलते हैं लाइनों की तरह
जीते है परिच्छेद की तरह
और कभी कभी धूल खाते है
अलमारियों मे
बंद किताबो
स्वर्णिम है वह शब्द
जिन्दगी की
कसोटी पर
घिस कर भी
जो नहीं बदले ,
आपदा मे भी
जिनका कलेवर
ना उतरे
स्वर्णिम है
वह शब्द
डोरी राखी की बन्धन प्यार का
डोरी राखी की
बन्धन प्यार का
संबंध सब होते
है मन के
बनते है मन से
निभते है मन से
आयत और श्लोक
"आयते " आती थी
होली दिवाली "श्लोकों" के घर
पर धमाके नहीं होते थे
"श्लोक" आते थे
ईद बकरीद " आयतों " के घर
पर खून खराबे नहीं होते थे
फिर अब क्यो ये हो रहा है
क्यो धमाके ओर ख़ून खराबे से
होली दिवाली ईद बकरीद
पर जशन नहीं मातम होते है
नहीं बाटते अब दर्द शब्द , शब्दो का
शब्द सहलाते थे शब्दो को
शब्द दुलारते शब्दो को
शब्द निहारते थे शब्दो को
समय वो और था जब
शब्द पुकारते थे शब्दो को
और शब्द सुनते थे शब्दो को
अब तो धमाके होते है
जो कान बहरे करते है
शब्दो को निशब्द करते है
अब सनाटा है
सूना है आंगन शब्दो को
बंद होगये है सब वह दरवाजे
जहाँ से आना जाना था
" आयत " ,और "सबद" ,
" श्लोक " , और"टेसटामेन्ट" का
अब शब्द देते है व्यथा शब्दो को
नहीं बाटते अब दर्द शब्द , शब्दो का
ref
आयत कुरान से , सबद गुरू ग्रंथ साहिब से , श्लोक गीता से , टेसटामेन्ट बाइबल से
शब्द ही ना समझे पर शब्दो को
किस शब्द ने किस शब्द से क्या कहा
किस शब्द से किस शब्द को चोट लगी
किस शब्द से किस शब्द को दर्द हुआ
किस शब्द से किस शब्द को प्यार हुआ
किस शब्द से किस शब्द को नफरत हुई
शब्दो के जाल मे शब्दो की उम्र हुई
पर शब्द ही ना समझे पर शब्दो को
निशब्द तुम्हारे शब्दो
शब्दो का खेल था
शब्दो से खेला था
निशब्द तुम्हारे शब्दो को
मन मे हमने सहेजा था
option 2
शब्दो का खेल था
शब्दो से खेला था
निशब्द तुम्हारे शब्दो को
शब्दो ने मेरे झेला था
option 3
शब्दो का खेल था
शब्दो से खेला था
निशब्द तुम्हारे शब्दो ने
शब्दो को मेरे झेला था
निशब्द फिर भी शब्द होते है
शब्दो को शब्द खीचते है
शब्दो से शब्द खिचते है
शब्दो मे शब्द होते है
निशब्द फिर भी शब्द होते है
शब्द कहाँ से लाऊँ वो ?
शब्द
जो गले मे अटकते है
शूल बनकर दिल को
चुभते है
शब्द
जो कलम से फिसलते है
फाँस बनकर दूसरो को
लगते है
शब्द
जो नहीं भरमाते है
सबको पसंद नहीं
आते है
शब्द
जो मन भाते है
सब को पसंद
आते है
शब्द
जो मन भाते है
वोही भरमाते है
शब्द
जो भाव





