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Wednesday, July 27, 2011

बिंदी, दर्प और अस्तित्व

क्या भूल गए की मेरी ये बिंदी
जिसका दर्प तुमको आज दिख रहा हैं
उसका अस्तित्व तुम से ही बना हैं
जिस दिन ये बिंदी मैने माथे पर लगा ली
उस दिन से अपने अस्तित्व को खो दिया
तुमने तो केवल समुद्र और दो गज जमी ही खोई
मेरा तो सारा अस्तित्व ही ये बिंदी ही लील गयी
और फिर भी इस का दर्प तुमको दिखता रहा

6 comments:

वन्दना said...

वाह बहुत ही सुन्दर भावों को संजोया है…………बेहतरीन्।

मनोज कुमार said...

एक यथार्थ।

Amit Chandra said...

बेहद उम्दा ख्याल।

Sunil Kumar said...

सच्चाई को दर्शाती एक सारगर्भित पोस्ट बहुत बहुत बधाई

दिगम्बर नासवा said...

दर्प को देखने का ये दृष्टिकोण भी अलग अंदाज़ रखता है ... बेहतरीन पंक्तियाँ हैं ...

प्रतुल वशिष्ठ said...

जब कोई विशाल
चमकता पिंड मरता है
बिंदी मात्र ही तो बचता है.
'बिंदी' यदि ब्लेक होल हो भी गई
तो 'अस्तित्व' आपका
इतना कमज़ोर क्यों था
जो उसके आकर्षण से खींच लिया गया.
'अस्तित्व' का
'ललाट के अलंकार' से भय खाना
क्या आपकी अति संवेदनशीलता तो नहीं
या फिर
यह वैसा ही है
जैसे एक कहानीकार की
'दो कलाकार' कहानी में
एक बीमार स्त्री पात्र ने
घनघोर तूफ़ान में लहरती लतिका के
'एकलौते पत्ते' से
स्वयं के प्राण को सम्बद्ध कर लिया था
वह टूटा कि प्राण देह से छूटे.
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