ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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वन्दे मातरम -- मातृ भूमि कुमाता कैसे हो जाये ??

ना जाने क्यूँ लोग बार बार

उनसे कहते हैं वन्दे मातरम गाओ

वन्दे मातरम

और

जन गण मन

तो वही गाते हैं

जिनके मन मे देश प्रेम होता हैं

मातृ भूमि को जो चाहेगे

वो ईश्वर से भी मातृ भूमि के लिये लड़ जायेगे

दो बीघा जमीन बस दो बीघा जमीन नहीं होती हैं

अन्न देती हैं , जीवन देती हैं

उस माँ कि तरह होती हैं

जो नौ महीने कोख मे रखती हैं

खून और दूध से सीचती हैं

पर माँ को माँ कब ये मानते हैं

कोख का मतलब ही कहां जानते हैं

मातृ भूमि भी माँ ही होती हैं

कुमाता नहीं हो सकती हैं

इसीलिये तो कर रही हैं इनको

अपनी छाती पर बर्दाश्त

ये जमीन हिन्दुस्तान कि

5 comments:

Common Hindu said...

nice

पी.सी.गोदियाल said...

लाख टके की बात कह डाले आपने रचना जी !

हिमांशु । Himanshu said...

एकदम सच्ची बात कही आपने ।

आभार ।

सुलभ सतरंगी said...

बिलकुल सही.

रेखा श्रीवास्तव said...

bahut sahi kaha, kash! in murkhon ko kuchh akla aa jaaye, jisase joojhana chahie , vah unhen dikhai nahin deta hai aur surkhiyon men aane ke liye naye mudde talash kar lete hain.