ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है । इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर अपनी पसंद के विचार खोजे

Tuesday, March 29, 2016

विधि की विडंबना देखिये


अब इंसान नहीं मरते हैं
धर्म के अनुयाई मरते हैं 

विधि की विडंबना देखिये 
जब बच्चा पैदा होता हैं 
नर्स पैर में 
माँ के नाम का टैग 
बाँध देती हैं 
माँ की गोद में देते ही 
माँ के नाम का टैग उतार देती हैं 


 
बड़ा सही तरीका हैं 
माँ नाम पैरो तले रौंदने का 
फिर उसको उतार कर फेंकने का 

विधि की विडंबना देखिये 
माँ की गोदी में आते ही 
धर्म बड़ा हो जाता हैं 
जाति प्रधान हो जाती हैं 
माँ का नाम फिर कहीं खो ही जाता हैं 

शायद इसीलिये मरने वाला 
भारत माँ का लाल नहीं रह जाता हैं 


विधि की विडंबना देखिये 
चाँद और मॉर्स पर जीवन खोजने वाले 
अपने धरती पर लहू बहाते हैं 

3 comments:

महेश कुशवंश said...

सच कहा

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 30 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

vibha rani Shrivastava said...

सार्थक लेखन