ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Wednesday, September 14, 2011

बस्ती

हिंदी वही जा बसती हैं
जहां बस्ती हैं अपनों की
फिर भी ना जाने क्यूँ लगता
किस देश मे बसती हैं अपनों की
किसी बस्ते में बंद हैं अपने
बसा के बस्ती अपनों की

3 comments:

संजय भास्कर said...

हिंदी दिवस पर
बहुत ही रोचक पोस्ट
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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जय हिंद जय हिंदी राष्ट्र भाषा

मनोज कुमार said...

हिंदी के समक्ष मुख्यत: दो चुनौतियां हैं – पहली भूमंडलीकरण के विरुद्ध सार्थक प्रतिरोध दर्ज करने की और दूसरी नवसाक्षरों में उभरी चेतना के उबाल को किन्हीं बड़े मूल्यों से जोड़ने की।
हिंदी तो दो पाटों को जोड़ता पुल है। इसी कारण से इसे उस भाषा की अनुगामिनी बनने की नियति प्रदान की गई जिसके खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिंदी तन कर खड़ी हुई थी।

Udan Tashtari said...

बहुत सही!


हिंदी दिवस पर बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं ..