ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Tuesday, September 20, 2011

जब ऐसा हो तो

क्या कभी आप के साथ भी ऐसा हुआ हैं
की
चाँद तो ढला हो पर रात ना बीती हो
और
सूरज तो निकला हो पर सुबह ना हुई हो

8 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

हुआ है न...मन हल्का हो जाता है जब ऐसा होता है।....

चाँद
अभी डूबा नहीं
हल्का पियरा गया है
सूर्य
अभी निकला नहीं
चमक की धमक है
जारी है
घने वृक्षों की ऊँची-ऊँची फुनगियों से निकल
इत-उत भागते
पंछियों का कलरव.....
http://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2011/09/blog-post_14.html

नीरज गोस्वामी said...

जब ऐसा होता है तो मन दुखी हो जाता है...काश ऐसा कभी न हो...

नीरज

संजय भास्कर said...

हर बार की तरह एक अलग ही अंदाज़ और अल्फाज़.

AK said...

एक रात की सहर न हुई तो कहर
क्यों
ध्रुव वासियों को सोच जहाँ महीनो
तक
किसी भी रात की सहर न होती है



सुरुचि और साहस का सयोंग दुर्लभ होता है
आभार

कुमार राधारमण said...

राजेन्द्र उपाध्याय की ये पंक्तियां कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त करती हैं-
कल रात भर बारिश होती रही
मगर पता ही नहीं चला
कई बार पता चल जाता है
एक बूंद का टपकना भी!

कविता रावत said...

dukhi man ho to aisa hi jaan padta hai..

Heera Bisht said...

aisa insan ke jeewan mai hota hai kavita jeewan ki vyakhya karti hai.

Yatish Jain said...

रात का अब चाँद से वास्ता नहीं रहा
सूरज का अब सुबह की तरफ रास्ता नहीं रहा
ढलना, निकलना बहुत दूर की बातें है
दुनिया मे दस्तूर का कोई ....... नहीं रहा