हुआ है न...मन हल्का हो जाता है जब ऐसा होता है।....
चाँद अभी डूबा नहीं हल्का पियरा गया है सूर्य अभी निकला नहीं चमक की धमक है जारी है घने वृक्षों की ऊँची-ऊँची फुनगियों से निकल इत-उत भागते पंछियों का कलरव..... http://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2011/09/blog-post_14.html
राजेन्द्र उपाध्याय की ये पंक्तियां कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त करती हैं- कल रात भर बारिश होती रही मगर पता ही नहीं चला कई बार पता चल जाता है एक बूंद का टपकना भी!
8 comments:
हुआ है न...मन हल्का हो जाता है जब ऐसा होता है।....
चाँद
अभी डूबा नहीं
हल्का पियरा गया है
सूर्य
अभी निकला नहीं
चमक की धमक है
जारी है
घने वृक्षों की ऊँची-ऊँची फुनगियों से निकल
इत-उत भागते
पंछियों का कलरव.....
http://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2011/09/blog-post_14.html
जब ऐसा होता है तो मन दुखी हो जाता है...काश ऐसा कभी न हो...
नीरज
हर बार की तरह एक अलग ही अंदाज़ और अल्फाज़.
एक रात की सहर न हुई तो कहर
क्यों
ध्रुव वासियों को सोच जहाँ महीनो
तक
किसी भी रात की सहर न होती है
सुरुचि और साहस का सयोंग दुर्लभ होता है
आभार
राजेन्द्र उपाध्याय की ये पंक्तियां कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त करती हैं-
कल रात भर बारिश होती रही
मगर पता ही नहीं चला
कई बार पता चल जाता है
एक बूंद का टपकना भी!
dukhi man ho to aisa hi jaan padta hai..
aisa insan ke jeewan mai hota hai kavita jeewan ki vyakhya karti hai.
रात का अब चाँद से वास्ता नहीं रहा
सूरज का अब सुबह की तरफ रास्ता नहीं रहा
ढलना, निकलना बहुत दूर की बातें है
दुनिया मे दस्तूर का कोई ....... नहीं रहा
Post a Comment