ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Saturday, October 01, 2011

योद्धा

योद्धा

जब भी दिखा हैं मुझे क़ोई योद्धा
नारी के हक़ की लड़ाई लड़ता
उसके आस पास दिखा हैं
एक मजमा उसको समझाता

क़ोई उसको माँ कहता हैं
क़ोई कहता हैं दीदी
क़ोई कहता हैं स्तुत्य
क़ोई कहता हैं सुंदर

और
फिर इन संबोधनों में
वो योधा कहां खो जाता हैं
पता ही नहीं चलता हैं

और
रह जाती हैं बस एक नारी
कविता , कहानी लिखती
दूसरो का ख्याल रखती
तंज और नारियों को
नारीवादी होने का देती

ना जाने कितने योद्धा
कर्मभूमि में कर्म अपने
बदल लेते हैं

और
मजमे के साथ मजमा बन
जीते हैं

7 comments:

shilpa mehta said...

wow ... but - didi, maan, yah sab bhi to naari ke roop hi hain n ?

प्रतुल वशिष्ठ said...
This comment has been removed by the author.
प्रतुल वशिष्ठ said...

कुछ सुधार के साथ ... फिर से टिप्पणी ..
_____________________
एक को करोंदे की सब्जी बहुत पसंद थी... इतनी पसंद कि नाश्ते में करोंदों को तलकर उसकी नमकीन चाय के साथ ली जाती.. फिर दोपहर का भोजन करोंदे की सब्जी, सलाद, अचार आदि कई चीजों के साथ किया जाता... रात्रि के भोजन में भी करोंदे-ही-करोंदे ... मतलब ये कि जहाँ देखो वहीँ करोंदे... कई दार्शनिक भी इसी स्वभाव के होते हैं... हर वस्तु और जीव में एक परमात्मा के दर्शन करते हैं... और कई काव्यशास्त्री भी हुए जिन्हें 'नवरस' नहीं भाये ... उन्होंने 'एकरस' को प्राथमिकता दी.. किसी ने 'करुण रस' को तो किसी ने 'शृंगार रस' को तो किसी ने 'शांत रस' को.
कहने का तात्पर्य ये है कि रचना जी की कोई भी रचना हो और किसी भी ब्लॉग पर हो ... वह 'नारी' बिना नहीं रहती....

'नारी' शब्द 'नर' शब्द से निर्मित है... और 'नर' शब्द की निर्मिती 'नृत' धातु से हुई है... क्योंकि मानव अपने भाव और विचारों को आंगिक संचालन से व्यक्त करता है इसलिये उसे 'नर' कहते हैं... और उसके स्त्रीवाची शब्द को 'नारी' कहते हैं.... ये भाषाविदों की व्यवस्था है.... इसी प्रकार का चिंतन हम 'स्त्री' शब्द पर भी कर सकते हैं... सभी बराबर हैं.. बस सामाजिक शिष्टता निभाने के लिये हम परस्पर संबंध बनाकर चलते हैं... इसमें हमें सुविधा भी होती है और किसी तीसरे के मन में अकारण संशय भी नहीं पनपते.

आपकी रचनाएँ .... मंथन करवाने को काफी अच्छी होती हैं.

Yatish Jain said...

ना जाने कितने योद्धा
कर्मभूमि में कर्म अपने
बदल लेते हैं

सही कहा आपने

मीनाक्षी said...

बहुत खूब.....आजकल अपने दोनों बेटों को यौद्धा बनाने में जुटी हूँ कि नारी के हर रूप को समझो और उस के हर पात्र के अनुरूप व्यवहार करना सीखो...

ZEAL said...

Some are warrior till their last breath. They never change, come what may. Hope you are not talking about the weak ones.

दिनेश पारीक said...

आप की रचना बड़ी अच्छी लगी और दिल को छु गई
इतनी सुन्दर रचनाये मैं बड़ी देर से आया हु आपका ब्लॉग पे पहली बार आया हु तो अफ़सोस भी होता है की आपका ब्लॉग पहले क्यों नहीं मिला मुझे बस असे ही लिखते रहिये आपको बहुत बहुत शुभकामनाये
आप से निवेदन है की आप मेरे ब्लॉग का भी हिस्सा बने और अपने विचारो से अवगत करवाए
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.com/
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