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Tuesday, December 27, 2011

बस पात्रो के नाम बदलते हैं

कहने को कहते हैं लोग
किस्सा हुआ ख़तम
कहानी हुई ख़तम
पर क्या कभी क़ोई कहानी ख़तम होती हैं
ख़तम होता हैं क्या कभी क़ोई किस्सा
जो जी लेते हैं पात्र बनकर कहानी को
उनके लिये कहानी जिन्दगी होती हैं
जो जी नहीं पाते कहानी को पात्र बनकर
उनके लिये कहानी मौत होती हैं
साल बदल जाते हैं पात्र बदल जाते हैं
जीवन बदल जाते हैं
शरीर मिट जाते हैं
आत्मा शरीर बदल लेती हैं पर
कहानी और किस्से वही रहते
प्यार भी नफरत भी
बस पात्रो के नाम बदलते हैं

12 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सटीक लिखा है .. कहानी कहाँ खत्म होती है ..अनवरत चलती रहती है ..मौत के बाद भी ..

मनोज कुमार said...

सही कहा ...
कुछ ऐतिहसिक पात्र हैं, लैला से लेकर ललिया तक .. पात्र बदल रहे हैं ... कहानी वही आज भी दुहराई जा रही है।

नीरज गोस्वामी said...

जो जी नहीं पाते कहानी को पात्र बनकर
उनके लिये कहानी मौत होती हैं

बहुत अच्छी रचना...बधाई स्वीकारें

नीरज

अनूप शुक्ल said...

क्या बात है जी! वाह!

वन्दना said...

जीवन बदल जाते हैं
शरीर मिट जाते हैं
आत्मा शरीर बदल लेती हैं पर
कहानी और किस्से वही रहते
प्यार भी नफरत भी
बस पात्रो के नाम बदलते हैं।
सटीक चित्रण किया है ………यही तो हो रहा है ……शानदार्।

Sunil Kumar said...

बहुत अच्छी रचना...बधाई

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जीवन बदल जाते हैं
शरीर मिट जाते हैं
आत्मा शरीर बदल लेती हैं पर
कहानी और किस्से वही रहते
प्यार भी नफरत भी
बस पात्रो के नाम बदलते हैं
क्या बात है रचना जी!!! मुझे तो पता ही नहीं था कि आप कविताएं भी लिखती हैं!! बहुत सुन्दर और सटीक.

Vijay Kumar Sappatti said...

वाह , क्या बात लिखी है आपने रचना . सच ही तो है प्रेम शाश्वत है . सिर्फ पात्र बदलते रहते है , कोई मजनू किसी और जन्म में रांझा बनता है. बस मैं तो यही कहूँगा कि जब तक ये सृष्टि रहती है . तब तक प्रेम रहेंगा . और प्रेम कथाये रहेंगी .
बहुत सुन्दर व्याख्या , जिसमे अध्यात्म का पुट भी है . बधाई जी

विजय

veerubhai said...

असल बात है ज़िन्दगी को जीना बिंदास .पात्र बनके .पात्रता को बनाए रखना .

Khilesh said...

बहोत अच्छा लगा आपका ब्लॉग पढकर ।

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मनीष सिंह निराला said...

behtarin likha hai...!
bahut sundar...!

kavi kulwant said...

नया साल मुबारक