कहने को कहते हैं लोग
किस्सा हुआ ख़तम
कहानी हुई ख़तम
पर क्या कभी क़ोई कहानी ख़तम होती हैं
ख़तम होता हैं क्या कभी क़ोई किस्सा
जो जी लेते हैं पात्र बनकर कहानी को
उनके लिये कहानी जिन्दगी होती हैं
जो जी नहीं पाते कहानी को पात्र बनकर
उनके लिये कहानी मौत होती हैं
साल बदल जाते हैं पात्र बदल जाते हैं
जीवन बदल जाते हैं
शरीर मिट जाते हैं
आत्मा शरीर बदल लेती हैं पर
कहानी और किस्से वही रहते
प्यार भी नफरत भी
बस पात्रो के नाम बदलते हैं
12 comments:
सटीक लिखा है .. कहानी कहाँ खत्म होती है ..अनवरत चलती रहती है ..मौत के बाद भी ..
सही कहा ...
कुछ ऐतिहसिक पात्र हैं, लैला से लेकर ललिया तक .. पात्र बदल रहे हैं ... कहानी वही आज भी दुहराई जा रही है।
जो जी नहीं पाते कहानी को पात्र बनकर
उनके लिये कहानी मौत होती हैं
बहुत अच्छी रचना...बधाई स्वीकारें
नीरज
क्या बात है जी! वाह!
जीवन बदल जाते हैं
शरीर मिट जाते हैं
आत्मा शरीर बदल लेती हैं पर
कहानी और किस्से वही रहते
प्यार भी नफरत भी
बस पात्रो के नाम बदलते हैं।
सटीक चित्रण किया है ………यही तो हो रहा है ……शानदार्।
बहुत अच्छी रचना...बधाई
जीवन बदल जाते हैं
शरीर मिट जाते हैं
आत्मा शरीर बदल लेती हैं पर
कहानी और किस्से वही रहते
प्यार भी नफरत भी
बस पात्रो के नाम बदलते हैं
क्या बात है रचना जी!!! मुझे तो पता ही नहीं था कि आप कविताएं भी लिखती हैं!! बहुत सुन्दर और सटीक.
वाह , क्या बात लिखी है आपने रचना . सच ही तो है प्रेम शाश्वत है . सिर्फ पात्र बदलते रहते है , कोई मजनू किसी और जन्म में रांझा बनता है. बस मैं तो यही कहूँगा कि जब तक ये सृष्टि रहती है . तब तक प्रेम रहेंगा . और प्रेम कथाये रहेंगी .
बहुत सुन्दर व्याख्या , जिसमे अध्यात्म का पुट भी है . बधाई जी
विजय
असल बात है ज़िन्दगी को जीना बिंदास .पात्र बनके .पात्रता को बनाए रखना .
बहोत अच्छा लगा आपका ब्लॉग पढकर ।
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behtarin likha hai...!
bahut sundar...!
नया साल मुबारक
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