ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Saturday, August 06, 2011

आयु बोध

आयु बोध
कौन कब और किसे करा पाया हैं
क्या आयु से बोध हमेशा ही आ जाता हैं
क्या "जी" और 'आदरणीय' कहने से
हर क़ोई हर किसी को
उसकी आयु योग्य आदर दे पाता हैं
विचारों के मंच पर
आयु बोध
महज विचारों से भटकना हुआ


कहा आपने
समझा आपने
सही आप का
गलत भी आपका
जब सब आप का था
तो क्षमा मेरी क्यूँ
वो भी आपकी हैं
अगर आप ने खुद को
क्षमा कर पाया
तो समझिये आयु बोध
हो पाया

7 comments:

Sunil Kumar said...

नये प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्ति, बहुत सुंदर..

प्रतुल वशिष्ठ said...

बस एक आदत बनाने की बात है.
मेरे घर के पास 'चौधरियों का गाँव'
जहाँ पिता-पुत्र नहीं
'बाप-बेटा' पाये जाते हैं.
जहाँ कई बेटे 'माँ' को 'माँ' नहीं 'बीबी' बोलते हैं.
जो बाप से सुना वही रिपीट किया.
अब उनमें ही कई परिवार अपने बच्चों को
पब्लिक स्कूलों में पढ़ाने लगे हैं.
जिन्हें टीचर शिष्टाचार के नाते सभी के नाम के साथ 'जी' बोलना सिखाते हैं.
इंग्लिश में 'Dear' यदि व्यवहार में है तो हिंदी भाषी क्षेत्र में 'आदरणीय' क्यों अटपटा लगे.
आइये इसे अधिक से अधिक व्यवहार में लायें...
सभी को अपना बनाएँ...
बनावटीपन यदि इसमें होगा भी
तो धीरे-धीरे पूरा समाप्त हो जायेगा.
नये संबोधन ... नये नियम अपनाने में थोड़ा झिझक होती ही है.
कोई बात नहीं .... आज न सही कल सही
आदत पड़ ही जायेगी.
धैर्य नहीं छोड़ना.

मनोज कुमार said...

आपकी कविता में कथ्य और संवेदना का सहकार है जिसका मकसद इस संसार को व्यवस्थित और अनुशासित देखने की आकांक्षा है।

रचना said...

जिन्हें टीचर शिष्टाचार के नाते सभी के नाम के साथ 'जी' बोलना सिखाते हैं.
इंग्लिश में 'Dear' यदि व्यवहार में है तो हिंदी भाषी क्षेत्र में 'आदरणीय' क्यों अटपटा लगे.

yahii samsyaa haen
uncle ji kehna nitant galat haen aur kewal hamarey yahaan upyog hotaa haen

yaa to chacha , tau phupha keh kar bachcho ko jee lagana sikhyae aur apni sanskriti sae jodae

uncle ji seekha kar aap dono bhashao ka galat upyog seekhatey haen jo aagey chal kar bachcho ko uphaas kaa paatr banataa haen

madam ji kehna sir ji kehna sarkaari schoolo me bahut haen wahii bachchey jab college pahuch kar public school kae bachcho kae saath khadae hotae hae apnae galat prayog kae liyae hansi kaa paatr bantey haen

sanskriti phir bhi nahin bachtee

वन्दना said...

एक अलग सोच देती ।

S.M.HABIB said...

नया दृष्टिकोण... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..
सादर..

रचना दीक्षित said...

बात तो सही है बस झिझक दूर करने की आवश्यकता है.