दफ़न की हुई
यादो की कब्र पर
जिन्दगी का दिया
बुझने की लालसा मे
टिमटिमा रहा हैं
जब दिया बुझ जायेगा
कब्र को मज़ार कहा जाएगा
और
मन्नत मांगने के लिये
कोई ना कोई
अपने प्यार को पाने के लिये
अपनी यादो के साथ
वहां आकर
फिर एक दिया जलायेगा
प्यार फिर कहीं का कहीं
किसी ना किसी याद मे
किसी यादो की कब्र को
मज़ार बना ही जाएगा
यादो की कब्र पर
जिन्दगी का दिया
बुझने की लालसा मे
टिमटिमा रहा हैं
जब दिया बुझ जायेगा
कब्र को मज़ार कहा जाएगा
और
मन्नत मांगने के लिये
कोई ना कोई
अपने प्यार को पाने के लिये
अपनी यादो के साथ
वहां आकर
फिर एक दिया जलायेगा
प्यार फिर कहीं का कहीं
किसी ना किसी याद मे
किसी यादो की कब्र को
मज़ार बना ही जाएगा
11 comments:
यह दिया बुझने ही न पाये ..
वाह बहुत खूब रचना जी .. मैंने भी बहुत पहले इसी थीम पर एक नज़्म लिखी थी .. बहुत प्यारे भाव है .. बधाई .
ओह यह कैसा क्रम है ..... गहन अभिव्यक्ति
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
बहुत सुंदर ....
यह दिया ना बुझने पाए
चाहे कोई आये न आये!
जीवन है, दिव्य ज्योति,
इसे, ऐसे क्यों बुझायें !
जब तक है मन में शक्ति, कितनों के काम आये!
क्या पता कहीं से खुशियाँ,एक दिन बरस ही जाएँ!
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kya bat!!!bahut badhiya
दफ़न की हुई
यादो की कब्र पर
जिन्दगी का दिया
बुझने की लालसा मे
टिमटिमा रहा हैं
@ आलोचना :
१] शुरू की दो पंक्तियों में आभासित 'पुनरोक्ति दोष' .... भावनात्मक तीव्रता दर्शाने के कारण से 'गुण' बन गया है.
यदि यूँ लिखा जाये तो पूरा दोषरहित हो...
'दफ़न की हुई यादों पर
ज़िंदगी का दीया'
या फिर
'यादों की कब्र पर
जिंदगी का दीया'
............ लेकिन भावनात्मक तीव्रता को झलकाने में 'रिपिटेशन' (शब्दों या अर्थों की 'दोहरावट') एक गुण बन जाता है. यहाँ भी ऐसा ही हुआ है. लेकिन
अंतिम पंक्तियों में 'दोष' क्षम्य नहीं .......दीपक के 'बुझने की लालसा में टिमटिमाने' की क्रिया व्यवहारिक नहीं.... 'टिमटिमाना' बुझने का द्योतक नहीं अपितु 'जलते रहने के लिये संघर्ष' का प्रतीक है.
बुझते हुए दीपक की 'लौ' बढ़ जाती है. वैसे भी 'कब्र' पर दीपक जलाने का रिवाज शायद भावनाओं के 'साम्प्रदायिक सौहार्द' वाले शैड्यूल में शामिल हो गया है. यदि कब्र पर दीये की जगह धूप/अगरबत्ती या लोबान जल रही होती तो सांस्कृतिक खामोशी मेरे पास भी होती. बहुत कम लोग कब्रों पर दीया जलाते हैं, वो भी आटे का.... प्रायः गर्भवती मुस्लिम औरतें, नहीं तो मोमबत्तियों का प्रयोग ही कब्रों पर देखने को मिलता है.
@ पूरी रचना..... भावनाओं की अठखेली भर है.... लेकिन है बहुत ही सुन्दर.
खासियत यही है कि --- यह प्यार के 'भावना चक्र' को उकेरती एक रचना है.
यादों की मजार पे ही टूटे हुवे दिल यादें ले के आते हैं ... मन्नत मांगते हैं ... दिये जलाते हैं ...
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