ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।

इस ब्लॉग पर जो भी लिखा मेरा निजी हैं उस दृष्टि कोण से आप असहमत हो तो कविता पढ़ कर भूल जाये और आगे जा कर
अपनी पसंद के विचार खोजे

Sunday, June 24, 2012

प्यार

दफ़न की हुई
यादो की कब्र पर
जिन्दगी का दिया
बुझने की लालसा मे
टिमटिमा रहा हैं

जब दिया बुझ जायेगा
कब्र को मज़ार कहा जाएगा
और
मन्नत मांगने के लिये
कोई ना कोई
अपने प्यार को पाने के लिये
अपनी यादो के साथ
वहां आकर
फिर एक दिया जलायेगा

प्यार फिर कहीं का कहीं
किसी ना किसी याद मे

किसी यादो की कब्र को
मज़ार बना ही जाएगा




11 comments:

M VERMA said...

यह दिया बुझने ही न पाये ..

Vijay Kumar Sappatti said...

वाह बहुत खूब रचना जी .. मैंने भी बहुत पहले इसी थीम पर एक नज़्म लिखी थी .. बहुत प्यारे भाव है .. बधाई .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ओह यह कैसा क्रम है ..... गहन अभिव्यक्ति

वन्दना said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

Sunil Kumar said...

बहुत सुंदर ....

सतीश सक्सेना said...


यह दिया ना बुझने पाए
चाहे कोई आये न आये!
जीवन है, दिव्य ज्योति,
इसे, ऐसे क्यों बुझायें !
जब तक है मन में शक्ति, कितनों के काम आये!
क्या पता कहीं से खुशियाँ,एक दिन बरस ही जाएँ!

अजय कुमार झा said...

आपके इस खूबसूरत पोस्ट का एक कतरा हमने सहेज लिया है साप्ताहिक महाबुलेटिन ,101 लिंक एक्सप्रेस के लिए , पाठक आपकी पोस्टों तक पहुंचें और आप उनकी पोस्टों तक , यही उद्देश्य है हमारा , उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी , टिप्पणी पर क्लिक करें और देखें

ana said...

kya bat!!!bahut badhiya

प्रतुल वशिष्ठ said...

दफ़न की हुई
यादो की कब्र पर
जिन्दगी का दिया
बुझने की लालसा मे
टिमटिमा रहा हैं

@ आलोचना :

१] शुरू की दो पंक्तियों में आभासित 'पुनरोक्ति दोष' .... भावनात्मक तीव्रता दर्शाने के कारण से 'गुण' बन गया है.

यदि यूँ लिखा जाये तो पूरा दोषरहित हो...

'दफ़न की हुई यादों पर
ज़िंदगी का दीया'
या फिर
'यादों की कब्र पर
जिंदगी का दीया'
............ लेकिन भावनात्मक तीव्रता को झलकाने में 'रिपिटेशन' (शब्दों या अर्थों की 'दोहरावट') एक गुण बन जाता है. यहाँ भी ऐसा ही हुआ है. लेकिन
अंतिम पंक्तियों में 'दोष' क्षम्य नहीं .......दीपक के 'बुझने की लालसा में टिमटिमाने' की क्रिया व्यवहारिक नहीं.... 'टिमटिमाना' बुझने का द्योतक नहीं अपितु 'जलते रहने के लिये संघर्ष' का प्रतीक है.

बुझते हुए दीपक की 'लौ' बढ़ जाती है. वैसे भी 'कब्र' पर दीपक जलाने का रिवाज शायद भावनाओं के 'साम्प्रदायिक सौहार्द' वाले शैड्यूल में शामिल हो गया है. यदि कब्र पर दीये की जगह धूप/अगरबत्ती या लोबान जल रही होती तो सांस्कृतिक खामोशी मेरे पास भी होती. बहुत कम लोग कब्रों पर दीया जलाते हैं, वो भी आटे का.... प्रायः गर्भवती मुस्लिम औरतें, नहीं तो मोमबत्तियों का प्रयोग ही कब्रों पर देखने को मिलता है.

प्रतुल वशिष्ठ said...

@ पूरी रचना..... भावनाओं की अठखेली भर है.... लेकिन है बहुत ही सुन्दर.

खासियत यही है कि --- यह प्यार के 'भावना चक्र' को उकेरती एक रचना है.

दिगम्बर नासवा said...

यादों की मजार पे ही टूटे हुवे दिल यादें ले के आते हैं ... मन्नत मांगते हैं ... दिये जलाते हैं ...