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Friday, July 01, 2011

घर बनाने का अधिकार नारी का नहीं होता

घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता
घर तो केवल पुरुष बनाते हैं
नारी को वहाँ वही लाकर बसाते हैं
जो नारी अपना घर खुद बसाती हैं
उसके चरित्र पर ना जाने कितने
लाछन लगाए जाते हैं

बसना हैं अगर किसी नारी को अकेले
तो बसने नहीं हम देगे
अगर बसायेगे तो हम बसायेगे
चूड़ी, बिंदी , सिंदूर और बिछिये से सजायेगे
जिस दिन हम जायेगे
उस दिन नारी से ये सब भी उतरवा ले जायेगे
हमने दिया हमने लिये इसमे बुरा क्या किया


कोई भी सक्षम किसी का सामान क्यूँ लेगा
और ऐसा समान जिस पर अपना अधिकार ही ना हो
जिस दिन चूड़ी , बिंदी , सिंदूर और बिछिये
पति का पर्याय नहीं रहेगे
उस दिन ख़तम हो जाएगा
सुहागिन से विधवा का सफ़र
लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा
क्यूंकि
घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता

14 comments:

प्रतुल वशिष्ठ said...

कवि-हृदय पाठको !
ये 'रचना' विपरीत लक्षणा की अच्छी उदाहरण है.

मीनाक्षी said...

खासकर भारत में इस क्रांतिकारी सोच को आने में अभी 40-50 साल और लगेंगे.. शायद उससे भी ज़्यादा...

वन्दना said...

एक कटु सच्चाई को चित्रित किया है ……………कभी मैने भी एक कविता लिखी थी "औरत का कोई घर नही होता" और आपने उसे आगे का मुकाम दे दिया। बहुत सुन्दर्।

लिंक साथ मे लगा रही हूँ।
"औरत का घर?"
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2009/02/blog-post_28.html

रचना said...

http://hastaakhshar.blogspot.com/2008/07/blog-post_17.html

vandana furast sae yae bhi daekhna

नीरज गोस्वामी said...

मजे की बात ये है के कहते सभी हैं कि घर नारी के बिना नहीं बनता लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है...आपने इस सत्य को अपनी रचना के माध्यम से बहुत सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है. उम्मीद है नारी की स्थिति पर आपने मेरे ब्लॉग पर श्री अखिलेश जी की ग़ज़ल जरूर पढ़ी होगी...

नीरज

कुश्वंश said...

घर नारी के बिना होता है क्या ? बात सोच की है सदियों से घिसटते सड़े गले संस्कारों की है जिन्हें बदलने में बहुत प्रयास की जरूरत है और ये प्रयास नारी को कम पुरुषों को ज्यादा करने होंगे .

Manish Kr. Khedawat said...

जिस दिन चूड़ी , बिंदी , सिंदूर और बिछिये
पति का पर्याय नहीं रहेगे
उस दिन ख़तम हो जाएगा
सुहागिन से विधवा का सफ़र ||

bahut hi behatreen lagi ye kavita !
aapko badhai ho rachna zi iss sunder rachna pe :)
_________________________________
किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||

शालिनी कौशिक said...

नारी को वहाँ वही लाकर बसाते हैं
जो नारी अपना घर खुद बसाती हैं
उसके चरित्र पर ना जाने कितने
लाछन लगाए जाते हैं
sahi likha hai rachna ji yahi satya hai.

राजन said...

आपने तो सबको चित्त कर दिया.बिल्कुल सच्ची बात.

संजय भास्कर said...

सीख सी प्रस्तुत करती अवधारणा।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! क्या बात कही..! सोलह आने सही।

ASHA BISHT said...

hi rachna ji. aap ki panktiya sarthak hai...

Vibha Rani Shrivastava said...

आपकी ये रचना कल 6 - 3 - 2012 नई-पुरानी हलचल पर पोस्ट की जा रही है .... ! आपके सुझाव का इन्तजार रहेगा .... !!

सतीश सक्सेना said...

बढ़िया गंभीर पोस्ट ...
आपको रंगोत्सव की शुभकामनायें !