घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता
घर तो केवल पुरुष बनाते हैं
नारी को वहाँ वही लाकर बसाते हैं
जो नारी अपना घर खुद बसाती हैं
उसके चरित्र पर ना जाने कितने
लाछन लगाए जाते हैं
बसना हैं अगर किसी नारी को अकेले
तो बसने नहीं हम देगे
अगर बसायेगे तो हम बसायेगे
चूड़ी, बिंदी , सिंदूर और बिछिये से सजायेगे
जिस दिन हम जायेगे
उस दिन नारी से ये सब भी उतरवा ले जायेगे
हमने दिया हमने लिये इसमे बुरा क्या किया
कोई भी सक्षम किसी का सामान क्यूँ लेगा
और ऐसा समान जिस पर अपना अधिकार ही ना हो
जिस दिन चूड़ी , बिंदी , सिंदूर और बिछिये
पति का पर्याय नहीं रहेगे
उस दिन ख़तम हो जाएगा
सुहागिन से विधवा का सफ़र
लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा
क्यूंकि
घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता
14 comments:
कवि-हृदय पाठको !
ये 'रचना' विपरीत लक्षणा की अच्छी उदाहरण है.
खासकर भारत में इस क्रांतिकारी सोच को आने में अभी 40-50 साल और लगेंगे.. शायद उससे भी ज़्यादा...
एक कटु सच्चाई को चित्रित किया है ……………कभी मैने भी एक कविता लिखी थी "औरत का कोई घर नही होता" और आपने उसे आगे का मुकाम दे दिया। बहुत सुन्दर्।
लिंक साथ मे लगा रही हूँ।
"औरत का घर?"
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2009/02/blog-post_28.html
http://hastaakhshar.blogspot.com/2008/07/blog-post_17.html
vandana furast sae yae bhi daekhna
मजे की बात ये है के कहते सभी हैं कि घर नारी के बिना नहीं बनता लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है...आपने इस सत्य को अपनी रचना के माध्यम से बहुत सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है. उम्मीद है नारी की स्थिति पर आपने मेरे ब्लॉग पर श्री अखिलेश जी की ग़ज़ल जरूर पढ़ी होगी...
नीरज
घर नारी के बिना होता है क्या ? बात सोच की है सदियों से घिसटते सड़े गले संस्कारों की है जिन्हें बदलने में बहुत प्रयास की जरूरत है और ये प्रयास नारी को कम पुरुषों को ज्यादा करने होंगे .
जिस दिन चूड़ी , बिंदी , सिंदूर और बिछिये
पति का पर्याय नहीं रहेगे
उस दिन ख़तम हो जाएगा
सुहागिन से विधवा का सफ़र ||
bahut hi behatreen lagi ye kavita !
aapko badhai ho rachna zi iss sunder rachna pe :)
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किसी और की हो नहीं पाएगी वो ||
नारी को वहाँ वही लाकर बसाते हैं
जो नारी अपना घर खुद बसाती हैं
उसके चरित्र पर ना जाने कितने
लाछन लगाए जाते हैं
sahi likha hai rachna ji yahi satya hai.
आपने तो सबको चित्त कर दिया.बिल्कुल सच्ची बात.
सीख सी प्रस्तुत करती अवधारणा।
वाह! क्या बात कही..! सोलह आने सही।
hi rachna ji. aap ki panktiya sarthak hai...
आपकी ये रचना कल 6 - 3 - 2012 नई-पुरानी हलचल पर पोस्ट की जा रही है .... ! आपके सुझाव का इन्तजार रहेगा .... !!
बढ़िया गंभीर पोस्ट ...
आपको रंगोत्सव की शुभकामनायें !
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