ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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"सिर्फ सोलह साल "

पार्क मे घूमते देखा
मैने एक लड़की को
आंखो मे पानी था
घूमने का कोई प्रयोजन
भी ना दिख रहा था
पूछा मैंने
" क्या प्यार से धोखा मिला " ?
कहा उसने
"मुझे प्यार से कुछ भी नहीं मिला
मुझे देने के लिये तो उसके पास धोखा भी नहीं था "
पूछा मैने
" फिर ये आँसू क्यों " ?
कहा उसने
" अपना सब कुछ उसे दे दिया ये उसने लिये नहीं "
कहा मैने
" तो बह जाने दो"
कहा उसने
" इन्हे तो अब मेरी आखो मे ही रहना है
ये बह गये तो उसकी याद भी बह जायगी "
पूछा मैने
"कितने दिन का साथ था "
कहा उसने
"सिर्फ सोलह साल "
कहा मैने
"भूल जाओ "
पूछा उसने
"किसे,
उसे या तकलीफ को ? "

12 comments:

Anonymous said...

Divine India said...
जब कोई बहुत अपना अपने आत्मन से जुदा हो जाता है तो उसका दर्द भी, हजार सुख की आशा से राह तकता है…प्रेम की इसी अराधन को महसूस किया जो अत्यंत निर्मल और स्नेह-सिक्त है…बहुत सुंदर रचना जी… कविता वही है जो मन की अनुभीतियों को छू जाए…।

June 20, 2007
Manish Kumar(मनीष कुमार) said...
कहा मैने
"भूल जाओ "
पूछा उसने
"किसे,
उसे या तकलीफ को ? "

मेरा कुछ भी कहना ना काफी होगा इस रचना के लिए।

बहुत आछा है, बस इतना कह सकता हूँ।

June 21, 2007
अनूप शुक्ल said...
बहुत अच्छा लगा इस कविता को पढ़कर!

June 21, 2007
कंचन चौहान said...
विश्वास मानिये रचना जी, कविताएं तो बहुत सी मन को छूती हैं पर ऐसा बहुत कम ही होता है मेरे साथ कि रचना की पंक्तियाँ जैसे जैसे समाप्त हों वैसे‍‍-वैसे आँखें नम होते होते बहने लगें और आज ऐसा ही हुआ....इससे अधिक मैं क्या लिखूँ.........!

June 21, 2007
Yatish Jain said...
भावों को शब्दों मै इतनी तरलता से उतार देना कि
वो सीधे दिल में प्रवाहित हो बहुत मुश्किल काम हैं और आप इस मुश्किल काम को बड़े ही आसान तरीके से कर लेती हैं।

June 21, 2007
Sharma ,Amit said...
अति सुंदर !!!

June 21, 2007

Anonymous said...

sunita (shanoo)
रचना जी बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना,
जिन्दगी का कड़ुआ सच कितना मुश्किल है जिसे सह पाना,आपने बड़ी आसानी से कविता में पिरो दिया,वाह दोस्त बहुत-बहुत बधाई...

सुनीता(शानू)

राजीव रंजन प्रसाद said...
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Udan Tashtari said...
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Anonymous said...

Vivek Rastogi said...
आपने सही कहा है वो केवल दर्द देकर जाता है, सब कुछ ले जाता है खुशी, चैन, नींद ..., बस छोड़ जाता है तो केवल आँसू ..... | वाह वाह दर्द को कलम से उकेरना कोई आपसे सीखे | बधाई ....

June 22, 2007


राजीव रंजन प्रसाद said...
संवेदित कर दिया आपने। उत्कृष्ठ रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

June 22, 2007


Udan Tashtari said...
बहुत गहरी रचना!! दर्द का चित्रण-बहुत अच्छी लगी यह कृति.

June 22, 2007

मोहिन्दर कुमार said...
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Rachna Singh said...
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Anonymous said...

मोहिन्दर कुमार said...
कविता पढ कर एक गीत याद आ गया
"या दिल कि सुनो दुनिया वालो
या मुझ को अभी चुप रहने दो
मै गम को खुशी कैसे कह दूं
जो कहते हैं उन को कहने दो"

बहुत सुन्दर भाव भरी रचना है

June 22, 2007

विकास कुमार said...

too good to comment.

शास्त्री जे सी फिलिप said...

2. The poem touched my heart (I am a counselor also,
so come across many a lives every day).
I very much appreciate the length of this poem. I
urge you to make this the minimum length.

Your poems are all pregnant with meaning, but
their brevity robs new readers (and those
uninitiated into poetry) from a full perception
of what you are trying to say.

Also, do try your hand at stories or incidents and
see if you can bind them in poems about two times
this size. I have a feeling you will be able to
do an excellent job.

-- शास्त्री जे सी फिलिप

शास्त्री जे सी फिलिप said...

हर व्यक्ति दर्द से दूर रहना चाहता है, लेकिन मानव हृदय की विशेषता है कि विशेष परिस्थितियों में वह दर्द को एक अनजान अनकहे तरीके से आत्मसात भी कर लेता है. दर्द एक ही समय में उसका शत्रु भी होता है मित्र भी, चुनौती भी देता है सांत्वना भी. गद्य में उस भावना या अनुभव का सटीक वर्णन नहीं हो सकता. उसकी कोई व्याख्या नही हो सकती. उसको तो सिर्फ या तो महसूस किया जा सकता है, या आलंकारिक भाषा में व्यक्त किया जा सकता. रचनाकार ने काव्य विधा में इसे अलंकृत किया है निम्न कविता में.

यदि पहले ही पाठ में यह कविता आपको समझ में आ जाती है तो आपने इस नहीं समझा बन्धु !!!

manya said...

kya kahun its simple superb.. say a lott ...... heart touching.. great work ....