ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालय
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है

हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

8 comments:

anitakumar said...

Rachna ji bahut hi jaandaar poem hai ...female issues are close to every female's heart but every body is not as vocal as you are ..keep it up but i hope u maintain the balance because very often to set things right people do unjustice to others

Sharma ,Amit said...

बहुत ही सशक्त... और उतना ही ज्वलंत... आलोचनाओं के लिये तैयार रहे ...

Shastri JC Philip said...

पूछे हैं प्रशन आपने इतने
सशक्त,
पहनाया है उनको आपने
आवरण ऐसे शब्दों का,
कि जरूर यह करेगा
मजबूर हम सब को
चिंतन के लिये
बहुत गहन -- शास्त्री जे सी फिलिप

जिस तरह से हिन्दुस्तान की आजादी के लिये करोडों लोगों को लडना पडा था, उसी तरह अब हिन्दी के कल्याण के लिये भी एक देशव्यापी राजभाषा आंदोलन किये बिना हिन्दी को उसका स्थान नहीं मिलेगा.

durga said...

very sharp and nicely written -
write more poems or/and articles on this topic, if possible and if you think appropriate..

great poem.. keep the good work going.
I am sure you will inspire many other women to stand up and say what they want - most of the times they dont even say..

good thing u wrote that poem.

Mired Mirage said...

स्त्री हो या पुरुष समय आ गया है कि हम अपनी कमियों को समझें और स्वीकारें ।
घुघूती बासूती

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

न जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि आपकी यह कविता अधूरी है।
इसे और विस्तार चाहिए।
इसे और धार चाहिए।
आपने तो इसमें चंद बातें कही हैं,
मुझे ऐसा लगा रहा है कि इसे
एक बहुत बडा संसार चाहिए।
बहरहाल... आपके तेवर और आपने जज्बों को मैं सलाम करता हूं।

हरिराम said...

यह अमिट सत्य है कि पुरुष सदा कमजोर था, आज भी है और सदा रहेगा। महिषासुर, मधुकैटभ, शुम्भ, निशुम्भ नामक राक्षसों को सारे देवता मिलकर भी हरा नहीं पाए थे, अनन्तः सभी देवताओं के तेज से 'दुर्गा' का आविर्भाव हुआ और असुरों का वध संभव हुआ। संसार से सारी बुराईयों को खत्म करने के लिए आप 'नारी-जगत' को दुर्गामाता बनना ही पड़ेगा। समस्त सत्पुरुषों (या देवताओं) की शुभकामना रूपी तेज सदा आपके साथ है।

आपने बिल्कुल सही चित्रण किया है। विदेशी पर्यटक रास्तों/रेलमार्गों के किनारे टट्टी करने को "भारतीय संस्कृति" की उपमा देते हैं। लेकिन जब छोटा बच्चा रास्ते के किनारे से कुछ दूर जाकर टट्टी बैठने का प्रयास करता है, तो उसकी माँ ही उसे रोकती है- "सड़क से नीचे मत उतरो, कोई कीड़ा मकोड़ा काट लेगा।" काश! कि सभी भारतीय नारियाँ अपने बेटों को सादगी, सफाई और सद्गुणों की शिक्षा देती तो भारत पवित्र और स्वर्ग बन जाता। मानव 'दानव' क्यों बनता?????

ANIL KANT said...

Bahut hi umda lekhahn shaili hai aapki aur uske sath hi achchhi kavita likhi hai aapne.