ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Monday, December 17, 2007

गंगा नहा कर मै आयी हूँ

बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ
जब भी कहीं कुछ मरता है
गंगा नहाना बहुत जरुरी होता है
अस्थिया भी विसर्जित गंगा मे ही होती है
पाप भी गंगा मे ही धुलते है
पाप ही नहीं पुण्य करके भी गंगा नहाते है

भटके हुओं को घर पंहुचा कर भी गंगा नहाते है
कायर रिश्तों की लाश को कब तक मै ढोती
दूसरो के पापो को कब तक मै सहजती
कर दिया है मैने विसर्जन
अनकहे के इंतज़ार का
बहुत दिन बाद आज फिर महसूस किया
कि जैसे गंगा नहा कर मै आयी हूँ

3 comments:

परमजीत बाली said...

जब भी कहीं कुछ मरता है
गंगा नहाना बहुत जरुरी होता है

बहुत बढिया!!!

Sharma ,Amit said...

कोई भी बडा काम पूरा होने पर कहा जाता है " गंगा नहा ली"...
अच्छे उदाहरण लिए है...

keerti vaidya said...

no words for this poem...