ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Monday, December 24, 2007

काई

रिश्तों के ऊपर
जब काई आजाती है

रिश्ते सड़ जाते है
लोग फिर झूठ बोल कर
खुद को बचाते है

और भ्रम मे रहते है
की उन्होने रिश्तों को
बचा लिया
रिश्ता तो कबका
दम तोड़ चूका होता है
काई के नीचे
झूठ और अविश्वाश कि गंध से
काई से अच्छे से अच्छा भी
हो जाता है बुरा

ये कविता अपने ओरिजनल फॉर्म मे इंग्लिश मे है और काफी लंबी हैं ।

3 comments:

Sharma ,Amit said...

बुरा मत मानिएगा... मुझे लगता है आज कल रिश्ता "काई" के साथ ही जी सकता है, वरना जिन्दगी की तपिश इस को झुलसा देगी. बस , अपना अपना मानना है, कोई वाद विवाद की इच्छा नही.
बाकी लिखा बहुत अच्छा है...

परमजीत बाली said...

बढिया रचना है।बहुत ही गहरी बात लिखी है-

झूठ और अविश्वाश कि गंध से
काई से अच्छे से अच्छा भी
हो जाता है बुरा

बहुत खूब!!पंक्तियां हैं।

Keerti Vaidya said...

apki yeh rachna mujhey sabsey achi lagi.....

apney sach kha hai....