ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Friday, January 04, 2008

सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै

सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
क्योंकी मै स्त्री हूँ , माँ हूँ , बहिन हूँ , पत्नी हूँ

उनसे तो मै फिर भी लाख दर्जे अच्छी हूँ
जिनका कोई मान समान ही नहीं हैं
जब भी
सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै
जिन्दगी की लड़ाई मै , आगे ही बढ़ी हूँ

औरो से उपर ही उठी हूँ
नहीं तोड़ सके हैं वह मेरा मनोबल
जो करते है सम्मानित , अपमानित मुझे
क्योंकी मैने ही जनम उनको दिया है
दे कर अपना खून जीवन उनको दिया है
दे कर अपना दूध बड़ा उनको किया है
नंगा करके मुझे जो खुश होते है

भूल जाते है उनके नंगेपन को
हमेशा मैने ही ढका है

8 comments:

anitakumar said...

बहुत खूब और बहुत सामयिक

durga said...

quite strongly worded and well written.

मीनाक्षी said...

यह लीचें हमसे ही जन्मी हैं... अंधी ममता देकर नंगेपन को ढकते हैं तभी बिना सोचे समझे कभी वह सम्मानित करता है तो कभी अपमानित करता है.

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

आज भारतीय समाज में एक बडे और समूल परिवर्तन की जरूरत है. आपने उस तरह सशक्त तरीके से इशारा किया है.

Sharma ,Amit said...

"सम्मानित , अपमानित होती हूँ मै" इस पंक्ति को हर कोई नही लिख सकता...
Extremely Beauty...

Poonam Agrawal said...

Sammanit apmanit -ye lafj hee apne
aap mei anokhe hai.Bhool jate hai unke nangepan ko hamne hee dhakaa hai....
Bahut sashakt prayaas hai.In panktiyon ke liye aap nishchit hee badhai ke pater hai.
Badhai

Keerti Vaidya said...

bhut khoobsurti sey apney aurat ke bavnao ko ukera hai.....

sunita (shanoo) said...

सुन्दर कविता...