ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Saturday, January 26, 2008

तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै

पार्वती भी मै
दुर्गा भी मै
सीता भी मै
मंदोदरी भी मै
रुकमनी भी मै
मीरा भी मै
राधा भी मै
गंगा भी मै
सरस्वती भी मै

लक्ष्मी भी मै
माँ भी मै
पत्नी भी मै
बहिन भी मै
बेटी भी मै
घर मे भी मै
मंदिर मे भी मै
बाजार मे भी मै

"तीन तत्वों " मे भी मै
पुजती भी मै
बिकती भी मै
अब और क्या
परिचय दू
अपने अस्तित्व का
क्या करुगी तुम से
करके बराबरी मै
जब तुम्हारे
अस्तित्व की
जननी हूँ मै
तुम जब मेरे बराबर
हो जाना तब ही
मुझ तक आना




पार्वती माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमनी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा , पवित्रता का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
बाजार , वासना का प्रतीक
तीन तत्व , अग्नि , धरती , वायु

7 comments:

mehek said...

bahut sahi kaha tumhare astitv ki janani nari hai,shayad koi kabhi uski barabari nahi kar sakega.

Shastriji said...

काफी समय के बाद आपकी कलम (कीबोर्ड) से एक लम्बी कविता दिखी. अच्छा लगा.

कविता का विषय प्रवेश एवं विषय प्रस्तुति समझने में आसान एवं सशक्त है. यें बातें हर व्यक्ति को बताई जानी चाहिये क्योंकि मानव जीवन में स्त्री के योगदान को कई बार लोग नजरअंदाज कर जाते हैं.

कविता की आखिरी पंक्तियां शायद पूरी तरह सच नहीं है. किसी का भी वास्तविक "अस्तित्व" स्त्री के कारण नहीं है. चाहे स्त्री हो या पुरुष, हम सब निमित्त मात्र हैं. स्त्री भी किसी नये जीवन को "अस्तित्व" मे लाने के लिये पुरुष पर निर्भर करती है.

अत: आखिरी पंक्तियों को कुछ संशोधित किया जाये तो यह भावभीनी कविता और सशक्त हो जायगी.

anitakumar said...

रचना जी कविता का अंत बहुत ही सशक्त्…

who cares said...

बहुत सुंदर .....

हर्षवर्धन said...

अच्छा लिखती हैं आप। तेवर बरकरार रखिए।

Kakesh said...

सशक्त.

गरिमा said...

कविता का अंत बहुत ही सशक्त्… वाकई मे कमाल की बात बोली आप :)