ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Saturday, March 08, 2008

होली

याद हैं होली जो बीती थी उस साल
जब हम साथ साथ ना होते हुए भी
साथ साथ थे ,
तरंगों से जुडे थे मन हमारे
कितने ही संदेशे आये गये
ना जाने कितने रंग बिखरे
रीता मन भीगा दोनों का
फिर आ रही हैं होली
पर रीति ही जायेगी
रंग अब ना बिखेर पायेगी

2 comments:

mehek said...

रीता मन भीगा दोनों का
फिर आ रही हैं होली
पर रीति ही जायेगी
रंग अब ना बिखेर पायेगी
bahut hi sundar

डॉ.ब्रजेश शर्मा said...

आपका ब्लॉग आपकी संवेदनशील सृजनधर्मिता
के सुरीले और मीठे राग से ओतप्रोत है ।
बधाई ।
कमेंट्स की हिदायतें अटपटी लगीं ।
शब्द और अर्थ के रिश्ते को अलग करने की विधि है क्या ?
अंतत: किसी भी कर्म के लिए उसका कर्ता ही उत्तरदायी होगा न !
बहरहाल आपका रचना धर्म सुरुचिपूर्ण और
प्रखर है ।