नहीं सौपा मैने अपना शरीर उसे
इसलिये
कि उसने मेरे साथ सात फेरे लिये
कि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दी
कि उसने मेरे साथ घर बसाया
कि उसने मुझे माँ बनाया
सौपा मैने अपना शरीर उसे
इस लिये
क्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थी
मेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार की
और उसके बदले नहीं माँगा मैने
उससे कुछ भी , ना रुपया , ना पैसे
ना घर , ना बच्चे , ना सामाजिक सुरक्षा
फिर भी मुझे कहा गया की मै दूसरी औरत हूँ !!
घर तोड़ती हूँ ।
प्रश्न है मेरा पहली औरतो से , क्या कभी तुम्हें
अपनी कोई कमी दिखती है ??
क्यो घर से तुम्हारे पति को कहीं और जाना पड़ता है ?
क्यो हमेशा तुम इसे पुरुष की कमजोरी कहती हो ?
क्यो कभी तुम्हें अपनी कोई कमजोरी नहीं दिखती ?
जिस शरीर को सौपने के लिये ,
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।
ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
COPYRIGHT 2007.© 2007. The blog author holds the copyright over all the blog posts, in this blog. Republishing in ROMAN or translating my works without permission is not permitted. Adding this blog to Hindi Aggregators without permission is voilation of Copy Right .
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Saturday, December 15, 2007
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।
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12 comments:
Quite bold....
दूसरी से लेकर पांचवी लाइन 'की' से शुरू हो रही है, पुनरुक्ति दोष? और इसे 'की' नहीं 'कि' होना चाहिए,
इसी प्रकार 'क्योंकी उस समय उसे जरुरत थी ...' में भी क्योंकि होगा.
शाब्दिक त्रुटियों के बावजूद बेहद विचारोत्तेजक और सोचने पर मजबूर देने वाली शब्द संयोजना !!
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत ---- चेतना को अन्दर तक झंझोड़ गई... साथ ही कई सवाल खड़े कर गई.. !!
बेबाक विचार... बेबाक कविता...
अति सुन्दर...अच्छा लगा आपको पढकर
यूँ ही लिखती रहें..
रचना , हम इस कविता के मूल भावों से सहमत नहीं। हर दूसरी औरत इसी तरह से मान लेती है कि पहली औरत में कोई कमी है, जरूरी नहीं कि ऐसा हो।
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत
bahut khoob ....
i am impressed by ur thoughts...very honest and bold feelings ...
कई बार ब्लॉग पर जाना हुआ.... रचना की रचनाएँ जैसे रचना की साँसें हों ... ..कभी गर्म ..कभी सर्द आहें .!! छोटी छोटी इच्छाएँ ...आशाएँ .... आकांक्षाएँ .....
कभी दूर दूर तक फैला सन्नाटा रेगिस्तान के विस्तार सा....
मैं गलत भी हो सकती हूँ ..... बुरा लगे तो क्षमा करना...
स्नेही
मीनाक्षी
No doubt a bold and honest write up... हमेशा की तरह कुछ अलग और कुछ नया पर सच कहने की कोशिश.. पूरी ईमानदारी से कहा गया सच... बस एक बात कहूंगी की हर बार पुरुष की कमजोरी या पहली औरत की कमी वजह नहीं होती एक नये रिश्ते के जन्म की .. प्रेम और समर्पण को किसी वजह की जरूरत नहीं.. ये तो भावनायें हैं.. जो पहली य दूसरी नहीं हो सकती...प्रेम होना और उसमें पूर्ण समर्पण होना सचमुच फ़क्र का विषय है.. इसमें शर्मिंदगी कैसी... प्यार सिंदूर और मंगलसूत्र या किसी सामाजिक पहचान का मोहताज नहीं.. ये तो बिना शर्त और बिना किसी उम्मीद के किया जाता है... क्या तन क्या मन प्रेम में सब न्यौछावर...
काव्य की दृष्टि से मुझे बस लय में थोड़ी कमी लगी.. but good thought...
very nice....ek sawal jo kai baar mere maan bhi ata hai...bebaak mein bhi kuch kehna chati hun....apni 32 saal ke umer mein mera anubahv asa he kuch reha hai...kai ase shadishuda purashu sey mile jo aaj bhi ghar ke bahar payar dhundh rehey hai ..ek asa thikana jahan vo payar paa sakey ...
galti kiski nahi pata...haan, par mainey samjha patnyo ko ab badlna hoga ..biwi ke sang apney pati ke premika ka role bhi ada karna hoga...
कविता की दृष्टि से देखा जाए तो यह रचना निश्चित ही सराहनीय है किंतु इसके भीतरी तत्व मुझे प्रभावित नहीं कर पाये…।
सच तो यह है कि प्रेम एक बहुत बड़ा अनुभव है जो कब कहाँ कैसे हो जाए पता ही नहीं चलता, यह बात औरतों पर भी उतनी ही लागू है जितनी की पुरुष पर… अंतर यह है कि सामाजिक पैबंद को तोड़ दिया जाए तो हमारे आस-पास ही ऐसे कई रिस्ते बने होते हैं जिसे हम स्वीकार न करे पर यह जरुरी नहीं कि सभी रिस्तों में वासना ही होती है पर एक अनकाहा रिस्ता जरुर होता है जो सामाजिक मानदण्डों के कारणत: दबा रहता है… महिलाएँ इसकारण भी इसे छुपाती हैं कि आज भी इस औघढ़ समाज में स्त्रियों की स्थिती अच्छी नहीं है…।
शादी तो एक विचार है यायावर से स्थायित्व की ओर पर प्रेम स्वतंत्र है…उन्मुक्त है,क्या परमात्मा से प्रेम को भी कोई इसी नजर से देखता है???
अनकही भावनाओ को अक सटीक रूप से कहना आपकी आदत है,
खुलेपन की आपके शब्दों मे इबादत है.
"दूसरी औरत" के इस दूसरे नज़रीये से आज पहली बार रुबरु हुआ.
क्या यही सच है??
या सच का ही एक आवश्यक टुकड़ा है??
कविता अच्छी लगी.
main us se bahut pyaar karti hun ...lekin main doosri aurat nahi banugi ...mujhe pehli ko side pe kar ke ..uska astitiva meeta kar ..apni jaan ke pass jana hai..apni jaan ko apna banana hai ... jisne bina kisi sharat ke use shareer suap diya wo dusri kaise huyi wo to usmein sama kar wo hi ho chuki hai doosri to pehle wali hai
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