ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Friday, March 14, 2008

बदले हुए युग की सीता और अहिल्या

क्यों बनू अहिल्या मै
शापित जीवन क्यों मै काँटू
बन कर इक शिला
जीवन अगर मेरा शापित है
तो भी क्यों न उसे जीउँ मै
क्यों इंतज़ार करू मै
किसी राम के आगमन का
नहीं मै अहिल्या नहीं बनूगी
युग अब बदल गया है
मर्यादा पुरुषोतम
राम नाम
कही खो गया है
जो पत्थर मे ड़ाल सकें प्राण

और शाप ना देना मुझको
ना लेना अब कोई परीक्षा
क्योकि युग बदल गया हैं
अब ऐसी ग़लती न करना
बदले हुए युग की सीता
और अहिल्या ने अब
लक्ष्मण रेखा अपने
चारो और खीच ली हैं
जहाँ आकर तुम्हारे
शाप की परिधि समाप्त हो जाती है
और तुम्हारे भस्म होने की
सीमा शुरू हो जाती हैं

6 comments:

mehek said...

bahut sahi aaj ram nahi rahe koi,ahilya bhi nahi.sundar kavita

अनूप शुक्ल said...

हां, ये हुई न कोई बात! अच्छा लगा!

दिनेशराय द्विवेदी said...

सही जवाब
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कविता न वो थी,
कविता न ये है।
जो बात उस में थी,
यह उस का जवाब भी नहीं है।

आज की अहिल्या
पहचानती हैं, छद्मवेशधारी इन्द्रों को,
पहचान कर प्रतिवाद करती हैं।

और उसे अपनाती भी हैं तो
बता कर कि वे पहचान गयीं।
वे अब अभिशापित नहीं होती,
होती हैं तो नहीं पड़ी रहती,
पत्थर सी हो कर युगों-युगों तक
राम की प्रतीक्षा में।

वे कहती हैं जो भी उन्हें कहना है
क्यों खिंचवाएं? वे,
लक्ष्मण रेखा भी अपने आस-पास
वे अपनी रेखाएं खुद खींचेंगी,
या लड़ेंगी खुद ही अपनी लड़ाई
अकेली भी नहीं बिलकुल,
लड़ेंगी अहिल्याओं को
साथ लेकर
बना कर अपना मोर्चा,
यही है उस का सही जवाब।
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Keerti Vaidya said...

ati sunder

Sharma ,Amit said...

सही कहा! सूरज जब निकलता है तो दुनिया देखती है

Rewa Smriti said...

Bahut achhi poem hai...!
Waqt aaye to aaj ki sita kal ke Ravan ko jalar bhsm bhi kar sakti hai!