ये ब्लोग कोलाज है शब्दो का क्योकि मै वह नहीं देख पाती जो सब देख पाते है.मेरी कविताओं मे अगर आप अपने को पाते है तो ये महज इतिफाक है । जिन्दगी की सचाईयाँ सबके लिये एक सी होती है सिर्फ नजरिया देखने का अलग अलग होता है ।
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Wednesday, March 19, 2008

बोली यादे

दिल के बंद दरवाजो पर
दस्तक देती यादो से पूछा मैने ,
क्यों बारबार बंद दरवाजो को खटखटाती हो ?
क्यों बिन बुलाये हर तीज त्यौहार चली आती हो ?
एक याद बोली ,
मै आती कहा हैं , तुम बुलाती हो
दूसरी याद बोली ,
आती हूँ इसलिये ताकि तुम अकेली ना महसूस करो
फिर तीसरी याद ने कहा ,
मै आती नहीं भेजी जाती हूँ
वो ही मुझे बार बार तुम तक भेजते हैं ,
जो ख़ुद आ नहीं पाते हैं
यादो की दस्तक जारी हैं ,
दिल के बंद दरवाजो पर

5 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर!

दिल के बंद दरवाजो पर
दस्तक देती यादो से पूछा मैने ,
क्यों बारबार बंद दरवाजो को खटखटाती हो ?
क्यों बिन बुलाये हर तीज त्यौहार चली आती हो ?

Keerti Vaidya said...

good didi..


last two lines zaberdust hai....

maza aa gaya padh kar

mehek said...

gehri yaadon ko saralta se bayan karti bahut hi sundar kavita hai,badhai,kavita ke liye,holi ke liye.

कंचन सिंह चौहान said...

फिर तीसरी याद ने कहा ,
मै आती नहीं भेजी जाती हूँ
वो ही मुझे बार बार तुम तक भेजते हैं ,
जो ख़ुद आ नहीं पाते हैं

गहरे तक उतर गए भाव

Rewa Smriti said...

फिर तीसरी याद ने कहा ,
मै आती नहीं भेजी जाती हूँ
वो ही मुझे बार बार तुम तक भेजते हैं ,
जो ख़ुद आ नहीं पाते हैं

Wonderful stanza! Yadein jaise bhi aaye bus hamare dahleez per unke kadam padne chahiye.